Delhi/08/12/2025/NIAT,Eidter Ram Parkash Vats
वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर संसद में हुई विशेष चर्चा का महत्व अत्यंत गौरवपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने सदन के सभी सदस्यों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह अवसर केवल स्मरण का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा और प्रेरणा का भी माध्यम है। वंदे मातरम ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को ऊर्जा, साहस और आत्मविश्वास प्रदान किया। इस गीत ने केवल राजनीतिक आज़ादी की लड़ाई का मंत्र नहीं दिया, बल्कि यह मातृभूमि की सेवा और उसकी रक्षा का प्रतीक भी बना। 150 वर्षों की इस यात्रा ने कई कालखंड देखे—जब देश गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, जब लोकतंत्र कमजोर था और जब देश की आज़ादी की भावना पर संकट आया। वंदे मातरम ने हर समय देशवासियों को प्रेरित किया और उन्हें साहस, त्याग और समर्पण का पाठ पढ़ाया।
वंदे मातरम की रचना 1875 में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की, जब देश अंग्रेजों के शासन में दबाव और अत्याचार सह रहा था। बंकिम चंद्र ने उस समय मातृभूमि की महिमा, ज्ञान और शक्ति को गीत के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस गीत ने लोगों में जागरूकता और देशभक्ति की भावना जगाई। गीत में मां भारती को न केवल सृजन और समृद्धि की देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया, बल्कि दुश्मनों के सामने साहस और संघर्ष का प्रतीक भी बनाया गया। वंदे मातरम ने स्वतंत्रता संग्राम में न केवल नेताओं और सैनिकों को, बल्कि महिलाओं और बच्चों को भी प्रेरित किया। बंगाल में प्रभात फेरियों से लेकर गांव-गांव तक यह गीत गूंजा और अंग्रेजों के अत्याचार के बावजूद यह जन-जन की आवाज़ बन गया।
वंदे मातरम केवल राजनीतिक आंदोलन का प्रतीक नहीं रहा, बल्कि यह सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना का भी माध्यम बन गया। यह गीत लोगों को स्वदेशी और स्वावलंबन के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करता रहा। लंदन के इंडिया हाउस में वीर सावरकर ने इसे गाया और महर्षि अरविंद घोष एवं विपिन चंद्र पाल ने इसके नाम से अखबार निकाले। देश के विभिन्न हिस्सों में यह गीत स्वतंत्रता की प्रेरणा का स्रोत बना। वी ओ चिदंबरम पिल्लई के स्वदेशी जहाज से लेकर राष्ट्रकवि सुब्रमण्यम भारती के तमिल गीतों तक, वंदे मातरम ने भारतीय संस्कृति, साहस और राष्ट्रभक्ति की ऊर्जा को प्रकट किया। महात्मा गांधी ने भी इसे देशभक्ति की प्रेरणा का स्रोत माना और लिखा कि वंदे मातरम भारतीयों में मातृभूमि की सेवा और देशभक्ति का जज्बा जगाता है।
हालांकि इतिहास में कुछ कालखंड ऐसे भी आए, जब वंदे मातरम के साथ अन्याय हुआ। मुस्लिम लीग और कुछ राजनीतिक दबावों के कारण इस गीत पर विवाद उठे और कांग्रेस को समझौता करना पड़ा। नेहरू जी ने उस समय वंदे मातरम की पृष्ठभूमि को लेकर मुस्लिम विरोध की चिंता व्यक्त की। बावजूद इसके, यह गीत देश की एकता और स्वतंत्रता की भावना का प्रतीक बना रहा। स्वतंत्रता संग्राम के वीरों—खुदीराम बोस, मदनलाल ढींगरा, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान और अन्य—ने वंदे मातरम के जयघोष के साथ अपने प्राणों की आहुति दी। यह गीत हर भारतीय के जीवन में देशभक्ति और समर्पण का मार्गदर्शन करता रहा।
आज, 150 वर्ष बाद वंदे मातरम केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के लिए प्रेरणा और नई ऊर्जा का स्रोत है। यह गीत आत्मनिर्भर भारत, विकसित भारत और समृद्ध भारत के सपनों को साकार करने का मार्गदर्शन देता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि वंदे मातरम के ऋण को स्वीकार करना और उसकी भावना के अनुरूप देश को आगे बढ़ाना हर भारतीय का कर्तव्य है। यह गीत देशवासियों को जोड़ने, संकटों में साहस देने और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों की याद दिलाने वाला एक अमूल्य संदेश है। जैसे यह गीत स्वतंत्रता संग्राम का मंत्र था, वैसे ही आज यह आत्मनिर्भर और विकसित भारत के निर्माण की प्रेरणा बन सकता है। इस अवसर पर संसद में हुई चर्चा ने वंदे मातरम की महत्ता को न केवल याद किया, बल्कि भविष्य के लिए दिशा भी दी।

