भारत माता के स्वतंत्र सैनानी पंडित जवाहरलाल नेहरू
भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि-कोटि नमन संपादक राम प्रकाश
भारत की स्वतंत्रता की पावन गाथा में पंडित जवाहरलाल नेहरू का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे केवल एक नेता नहीं, बल्कि राष्ट्र की चेतना, संघर्ष और भविष्य के स्वप्न के प्रतीक थे। उनकी जीवन यात्रा त्याग, तपस्या और राष्ट्रभक्ति की ऐसी अमर कहानी है, जो आज भी हर भारतीय के हृदय में देशप्रेम की ज्योति प्रज्वलित करती है।
14 नवंबर 1889 को इलाहाबाद (प्रयागराज) की पावन धरती पर जन्मे नेहरू एक समृद्ध परिवार में पले-बढ़े, किंतु उनके मन में विलासिता नहीं, बल्कि राष्ट्र सेवा का संकल्प जागृत हुआ। उनके पिता मोतीलाल नेहरू एक प्रतिष्ठित वकील थे, परंतु पुत्र ने अपने जीवन का मार्ग संघर्ष और बलिदान की राह पर चुना। इंग्लैंड के हैरो स्कूल और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी उनका हृदय भारत माता की पुकार से विचलित रहा।
सन 1916 में जब उनकी भेंट महात्मा गांधी से हुई, तब उनके जीवन ने एक नया मोड़ लिया। गांधीजी के विचारों से प्रेरित होकर नेहरू ने स्वतंत्रता संग्राम में स्वयं को पूर्णतः समर्पित कर दिया। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे महान आंदोलनों में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई। उनका जीवन जेल की यातनाओं से भरा रहा, किंतु उनका साहस कभी डगमगाया नहीं। उन्होंने लगभग 9 वर्षों तक कारावास सहा, परंतु स्वतंत्रता की लौ को मंद नहीं होने दिया।
1929 में लाहौर अधिवेशन में नेहरू ने ‘पूर्ण स्वराज’ का नारा बुलंद किया। यह केवल एक घोषणा नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्र भविष्य की नींव थी। उनके शब्दों में जो जोश था, उसने करोड़ों भारतीयों के हृदय में स्वतंत्रता की ज्वाला प्रज्वलित कर दी।15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब नेहरू देश के प्रथम प्रधानमंत्री बने। उन्होंने केवल शासन नहीं किया, बल्कि एक नए भारत का निर्माण किया।
उनके नेतृत्व में भारत ने लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाया। उन्होंने बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना कर देश को आत्मनिर्भर बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। शिक्षा के क्षेत्र में IIT और AIIMS जैसे संस्थानों की स्थापना कर उन्होंने ज्ञान का दीप जलाया।विदेश नीति के क्षेत्र में उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी, जिससे भारत ने विश्व राजनीति में स्वतंत्र और संतुलित स्थान प्राप्त किया।
पंचशील सिद्धांतों के माध्यम से उन्होंने विश्व शांति का संदेश दिया। हालांकि 1962 का भारत-चीन युद्ध उनके जीवन का कठिन अध्याय बना, परंतु उन्होंने हर चुनौती का सामना धैर्य और संकल्प के साथ किया।नेहरू केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील लेखक भी थे। उनकी कृतियाँ ‘भारत की खोज’ और ‘विश्व इतिहास की झलक’ आज भी ज्ञान का अमूल्य भंडार हैं। बच्चों के प्रति उनके स्नेह के कारण ही उन्हें ‘चाचा नेहरू’ कहा गया और उनके जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
27 मई 1964 को जब उनका निधन हुआ, तब पूरा राष्ट्र शोक में डूब गया। परंतु उनके विचार, उनके आदर्श और उनके सपने आज भी जीवित हैं। वे हर उस भारतीय के दिल में बसते हैं, जो एक मजबूत, समृद्ध और एकजुट भारत का सपना देखता है।नेहरू की गाथा हमें यह सिखाती है कि राष्ट्र निर्माण केवल सत्ता से नहीं, बल्कि समर्पण, त्याग और दूरदृष्टि से होता है। उनका जीवन एक प्रेरणा है—एक ऐसा दीपक, जो आने वाली पीढ़ियों को सदैव मार्ग दिखाता रहेगा।

