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हिमाचल: हाई कोर्ट का बड़ा फैसला — लोक अदालतें आपसी सहमति से तलाक का आदेश पारित नहीं कर सकतीं

RamParkash Vats
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शिमला/22/11/2025 ब्यूरो:हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था स्थापित करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि लोक अदालतों के पास आपसी सहमति से तलाक (Mutual Consent Divorce) देने का अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल की एकल पीठ ने यह टिप्पणी एक याचिका को स्वीकारते हुए की, जिसमें सोलन जिले की लोक अदालत द्वारा पारित एक आपसी सहमति वाले तलाक के आदेश को चुनौती दी गई थी।

कोर्ट ने कहा कि नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (लोक अदालत) रेगुलेशंस 2009 के रेगुलेशन 17(7) के तहत लोक अदालतें न तो आपसी सहमति से तलाक दे सकती हैं और न ही जमानत से जुड़ा कोई आदेश पारित कर सकती हैं। जब नियम ही ऐसे किसी आदेश को पारित करने से रोकता है, तब लोक अदालत द्वारा दिया गया तलाक का अवार्ड स्वतः ही कानून की नजर में अवैध और अमान्य हो जाता है।

हाई कोर्ट का फैसला: लोक अदालत का अवार्ड रद्द

याचिका स्वीकारते हुए न्यायालय ने सोलन लोक अदालत के चेयरमैन द्वारा 9 सितंबर को पारित किए गए तलाक अवार्ड को रद्द कर दिया।
याचिकाकर्ता पत्नी ने अदालत को बताया कि लोक अदालत ने ऐसी शक्ति का इस्तेमाल किया जो उसे कानून ने कभी दी ही नहीं थी। इसलिए उसका आदेश प्रारंभ से ही अवैध, गैर-कानूनी और टिकने योग्य नहीं है।

रेगुलेशन 17(7) स्पष्ट:

लोक अदालत किसी भी प्रकार की जमानत नहीं दे सकतीलोक अदालत आपसी सहमति से तलाक नहीं दे सकती।इस प्रकार लोक अदालत का विवादित निर्णय नियमों के बिल्कुल विपरीत पाया गया।

अदालत की टिप्पणी

न्यायालय ने कहा कि जब तक किसी प्राधिकरण को कानून स्पष्ट शक्तियाँ न दे, वह ऐसे गंभीर और संवेदनशील मामलों में आदेश नहीं दे सकता। तलाक और जमानत जैसे विषय न्यायिक प्रक्रिया की परिधि में आते हैं और इनका निर्णय केवल सक्षम न्यायालय ही कर सकते हैं।

संबंधित संदर्भ: दुष्कर्म मामले में बहस

सुनवाई के दौरान यह तर्क भी दिया गया कि जब रेगुलेशन स्पष्ट रूप से लोक अदालत को जमानत या तलाक देने से रोकता है, फिर भी लोक अदालत द्वारा इस तरह का आदेश देना पूरी तरह गलत है। इसलिए उसका अवार्ड रद्द होना न्यायसंगत है।

हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद राज्यभर में लोक अदालतों द्वारा पारित ऐसे सभी अवार्डों पर प्रभाव पड़ सकता है। यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया की सीमाओं और लोक अदालतों की शक्तियों को स्पष्ट करता है तथा साफ संदेश देता है कि लोक अदालतें केवल समझौते योग्य मामलों का निपटारा कर सकती हैं, न कि तलाक या जमानत जैसे न्यायिक आदेश जारी

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