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चंबा अब इंतज़ार नहीं, अधिकार चाहता है—रेलवे का अधिकार।चंबा अब भी रेल संपर्क से दूर—विकास, पर्यटन और जनजीवन पर गहरा असर

RamParkash Vats
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संपादकीय चिंतन मंथन और विश्लेषण - संपादक राम प्रकाश वत्स

चंबा की भौगोलिक स्थिति निश्चित रूप से चुनौतीपूर्ण है—ऊँचे पहाड़, गहरी घाटियाँ और सीमांत क्षेत्र की कठिन परिस्थितियाँ इस इलाके को निर्माण कार्यों के लिए जटिल बनाती हैं। लेकिन आधुनिक भारत ने इस तरह की कठिनाइयों को पार करने की क्षमता सिद्ध कर दी है। जम्मू–कश्मीर में उधमपुर–श्रीनगर–बारामुला रेल परियोजना हिमालय के सबसे कठिन इलाकों को भी रेल नेटवर्क से जोड़ने का सफल उदाहरण बन चुकी है। इसी तरह अरुणाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर के पर्वतीय राज्यों में भी रेलवे ने अभूतपूर्व प्रगति दर्ज की है। इन उदाहरणों को देखते हुए यह कहना कि चंबा को रेल मार्ग से जोड़ना ‘तकनीकी रूप से असंभव’ है—अब बिल्कुल भी तर्कसंगत नहीं बचता। असल मुद्दा तकनीक नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छा, प्राथमिकता और सकारात्मक दृष्टिकोण का है।

आज चंबा के लोग एक ही प्रश्न पूछ रहे हैं— “कब मिलेगा जिला को रेलवे का हक?”
यह सवाल अब महज़ भावनात्मक नहीं, बल्कि विकास से जुड़ा हुआ तथ्यात्मक प्रश्न बन चुका है। इस क्षेत्र को अब केवल आश्वासनों की नहीं, बल्कि ठोस और निर्णायक कदमों की जरूरत है।

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