वज़ीर राम सिंह पठानिया, वह युवक जिसने हिमालयी माटी की इज़्ज़त के लिए अपनी धड़कनें तक न्योछावर कर दीं।
हिमाचल की वीरभूमि कांगड़ा ने अनेक रणबांकुरे जन्मे, किंतु शहीद वज़ीर राम सिंह पठानिया जैसा अदम्य साहस और अटल देशभक्ति वाला योद्धा विरला ही हुआ। युवा अवस्था से ही उन्होंने अंग्रेजी शासन की अन्यायपूर्ण नीतियों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजाया। उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि उनके नाम से ही अंग्रेज अफसरों के मन में भय उत्पन्न हो जाता था। रणभूमि में वे केवल सेनानायक नहीं, बल्कि प्रेरणा के स्रोत थे—अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर शत्रु पर ऐसा आक्रमण करते कि उनके साथियों का मनोबल कई गुना बढ़ जाता। जंगलों और पहाड़ी मार्गों में गुरिल्ला युद्ध की रणनीति उनके हाथों में अत्यंत प्रभावी हथियार बन गई, जिसने अंग्रेजों को बार-बार परास्त किया। अपने सैनिकों के लिए वे ढाल थे और अत्याचारियों के लिए प्रचंड अग्नि। देश की स्वतंत्रता उनके लिए केवल विचार नहीं, बल्कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य थी। कठिन परिस्थितियों, संसाधनों की कमी और दुश्मन की विशाल शक्ति के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अंतिम सांस तक मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत रहे। उनकी वीरगाथा आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती है कि सच्चा देशप्रेम साहस, त्याग और अपने कर्तव्य के प्रति अटल निष्ठा से जगमगाता है

वज़ीर राम सिंह पठानिया—सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि हिमाचल की आत्मा, शौर्य का प्रतीक और आज़ादी का अमर दीप हैं।
हिमाचल की पर्वतमाला केवल प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि वीरता और त्याग की अनगिनत कहानियों का अमर इतिहास भी है। इन्हीं कहानियों में एक नाम ऐसा भी है जिसके शौर्य का प्रताप सुनते ही अंग्रेजी अफसरों की धड़कनें तेज़ हो जाती थीं—वज़ीर राम सिंह पठानिया, वह युवक जिसने हिमालयी माटी की इज़्ज़त के लिए अपनी धड़कनें तक न्योछावर कर दीं।कांगड़ा की वीरभूमि नूरपुर उपमंडल के बासा बाजीरा गाँव में 10 अप्रैल 1824 को जन्मा यह वीर बचपन से ही तेजस्विता का प्रतीक था। मंत्री श्याम सिंह के घर पले-बढ़े राम सिंह में अदम्य साहस, तेज, और न्यायप्रियता कूट-कूटकर भरी थी। जब देश अंग्रेजी दमन की जंजीरों में जकड़ रहा था, तभी उनके भीतर प्रतिरोध की ज्वाला प्रज्वलित हो रही थी—एक ऐसी ज्वाला, जिसने आगे चलकर अंग्रेजी साम्राज्य को हिलाकर रख दिया।
युवावस्था में ही जागी क्रांति की लौ
1846 की अंग्रेज–सिख संधि ने पहाड़ों की रियासतों को परतंत्र बना दिया। नूरपुर के राजा वीर सिंह का देहांत और उनके उत्तराधिकारी जसवंत सिंह से अधिकार छीनकर अंग्रेजी सरकार द्वारा मात्र पाँच हजार रुपये में रियासत को खरीद लेना सिर्फ अन्याय ही नहीं, बल्कि हिमालयी स्वाभिमान पर एक बड़ा अपमान था।यह अपमान वह चिंगारी बना जिसने राम सिंह के भीतर के योद्धा को जगा दिया।उन्होंने कटोच राजपूतों और स्थानीय वीर युवकों के साथ एक छोटी सी सेना संगठित की और अचानक अंग्रेजी टुकड़ी पर धावा बोल दिया। इस आक्रमण ने इतने तेज़ और भीषण रूप से अंग्रेजों को झकझोर दिया कि कई सैनिक वहीं ढेर हो गए और बचे-खुचे प्राण बचाकर भाग खड़े हुए।नूरपुर की भूमि पर पहली बार अंग्रेजों के विरुद्ध विजय का झंडा फहराया—और यह झंडा था राम सिंह का।जसवंत सिंह ने प्रसन्न होकर उन्हें नूरपुर रियासत का वज़ीर नियुक्त किया। लेकिन यह उपाधि नहीं, बल्कि एक संकल्प था—हिमाचल की धरती से अंग्रेजों का नामोनिशान मिटाने का संकल्प।
जब एक युवा वीर ने अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला दी
मात्र मुट्ठीभर साथियों के साथ, बिना किसी भारी हथियार के, राम सिंह ने अंग्रेजों के कई ठिकानों पर धावा बोला। यह सिर्फ हमला नहीं था—यह उस साम्राज्य के अहंकार पर चोट थी जो खुद को दुनिया का सर्वशक्तिमान समझता था।अंग्रेज समझ गए कि यह युवा केवल सैनिक नहीं, बल्कि एक ऐसी आग है जिसे बुझाना आसान नहीं होगा। सीधी लड़ाई में उसे हराना असंभव था—इसलिए उन्होंने अपनाया अपना पुराना हथियार… षड्यंत्र।
धोखे से गिरफ्तारी—और कालापानी की यातना
एक दिन जब राम सिंह पूजा-पाठ में व्यस्त थे, अंग्रेजों ने घेराबंदी कर उन्हें कपटपूर्वक गिरफ्तार कर लिया। आरोप लगाया गया—राजद्रोह का, सशस्त्र विद्रोह का, अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने के प्रयास का। सजा सुनाई गई—कालापानी।पहले अंडमान, फिर रंगून। वहाँ उनके साथ ऐसे अमानवीय अत्याचार हुए कि सुनकर भी रूह कांप जाए। लेकिन उनकी आत्मा झुकी नहीं, उनके होंठों पर आज़ादी का मंत्र थमता नहीं था।
24 वर्ष की आयु में अमर बलिदान
11 नवंबर 1849—यह तारीख़ केवल एक वीर की शहादत की नहीं, बल्कि औपनिवेशिक अत्याचारों के विरुद्ध हिमालयी प्रतिरोध की एक अमर गाथा की तारीख़ है।केवल 24 वर्ष की आयु में राम सिंह पठानिया ने वह कर दिखाया जो उस समय अनेक विशाल सेनाएँ भी नहीं कर सकीं—उन्होंने अंग्रेजी साम्राज्य के मन में डर उतार दिया।
इतिहास के पन्नों में अमर, भविष्य की पीढ़ियों के लिए प्रेरणा
राम सिंह पठानिया केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि हिमालय का वह तूफ़ान थे जिसने पराधीनता की चुप्पी को चीरकर स्वतंत्रता की पहली गंभीर गूँज पैदा की।उनकी वीरगाथा हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता केवल तलवार से नहीं, बल्कि साहस, स्वाभिमान और अन्याय को चुनौती देने की हिम्मत से मिलती है।आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस लेते हैं, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस मिट्टी में ऐसे भी वीर जन्मे थे, जिन्होंने चंद साथियों और सीमित संसाधनों के बावजूद एक साम्राज्य को चुनौती देने का साहस किया।
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