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शौर्य के प्रतीक वज़ीर राम सिंह पठानिया: हिमालय का वह युवा सिंह जिसने अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला दी

RamParkash Vats
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संपादकीय चिंतन मंथन और विश्लेषण - संपादक राम प्रकाश वत्स

हिमाचल की पर्वतमाला केवल प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि वीरता और त्याग की अनगिनत कहानियों का अमर इतिहास भी है। इन्हीं कहानियों में एक नाम ऐसा भी है जिसके शौर्य का प्रताप सुनते ही अंग्रेजी अफसरों की धड़कनें तेज़ हो जाती थीं—वज़ीर राम सिंह पठानिया, वह युवक जिसने हिमालयी माटी की इज़्ज़त के लिए अपनी धड़कनें तक न्योछावर कर दीं।कांगड़ा की वीरभूमि नूरपुर उपमंडल के बासा बाजीरा गाँव में 10 अप्रैल 1824 को जन्मा यह वीर बचपन से ही तेजस्विता का प्रतीक था। मंत्री श्याम सिंह के घर पले-बढ़े राम सिंह में अदम्य साहस, तेज, और न्यायप्रियता कूट-कूटकर भरी थी। जब देश अंग्रेजी दमन की जंजीरों में जकड़ रहा था, तभी उनके भीतर प्रतिरोध की ज्वाला प्रज्वलित हो रही थी—एक ऐसी ज्वाला, जिसने आगे चलकर अंग्रेजी साम्राज्य को हिलाकर रख दिया।

1846 की अंग्रेज–सिख संधि ने पहाड़ों की रियासतों को परतंत्र बना दिया। नूरपुर के राजा वीर सिंह का देहांत और उनके उत्तराधिकारी जसवंत सिंह से अधिकार छीनकर अंग्रेजी सरकार द्वारा मात्र पाँच हजार रुपये में रियासत को खरीद लेना सिर्फ अन्याय ही नहीं, बल्कि हिमालयी स्वाभिमान पर एक बड़ा अपमान था।यह अपमान वह चिंगारी बना जिसने राम सिंह के भीतर के योद्धा को जगा दिया।उन्होंने कटोच राजपूतों और स्थानीय वीर युवकों के साथ एक छोटी सी सेना संगठित की और अचानक अंग्रेजी टुकड़ी पर धावा बोल दिया। इस आक्रमण ने इतने तेज़ और भीषण रूप से अंग्रेजों को झकझोर दिया कि कई सैनिक वहीं ढेर हो गए और बचे-खुचे प्राण बचाकर भाग खड़े हुए।नूरपुर की भूमि पर पहली बार अंग्रेजों के विरुद्ध विजय का झंडा फहराया—और यह झंडा था राम सिंह का।जसवंत सिंह ने प्रसन्न होकर उन्हें नूरपुर रियासत का वज़ीर नियुक्त किया। लेकिन यह उपाधि नहीं, बल्कि एक संकल्प था—हिमाचल की धरती से अंग्रेजों का नामोनिशान मिटाने का संकल्प।

मात्र मुट्ठीभर साथियों के साथ, बिना किसी भारी हथियार के, राम सिंह ने अंग्रेजों के कई ठिकानों पर धावा बोला। यह सिर्फ हमला नहीं था—यह उस साम्राज्य के अहंकार पर चोट थी जो खुद को दुनिया का सर्वशक्तिमान समझता था।अंग्रेज समझ गए कि यह युवा केवल सैनिक नहीं, बल्कि एक ऐसी आग है जिसे बुझाना आसान नहीं होगा। सीधी लड़ाई में उसे हराना असंभव था—इसलिए उन्होंने अपनाया अपना पुराना हथियार… षड्यंत्र

एक दिन जब राम सिंह पूजा-पाठ में व्यस्त थे, अंग्रेजों ने घेराबंदी कर उन्हें कपटपूर्वक गिरफ्तार कर लिया। आरोप लगाया गया—राजद्रोह का, सशस्त्र विद्रोह का, अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने के प्रयास का। सजा सुनाई गईकालापानी।पहले अंडमान, फिर रंगून। वहाँ उनके साथ ऐसे अमानवीय अत्याचार हुए कि सुनकर भी रूह कांप जाए। लेकिन उनकी आत्मा झुकी नहीं, उनके होंठों पर आज़ादी का मंत्र थमता नहीं था।

11 नवंबर 1849—यह तारीख़ केवल एक वीर की शहादत की नहीं, बल्कि औपनिवेशिक अत्याचारों के विरुद्ध हिमालयी प्रतिरोध की एक अमर गाथा की तारीख़ है।केवल 24 वर्ष की आयु में राम सिंह पठानिया ने वह कर दिखाया जो उस समय अनेक विशाल सेनाएँ भी नहीं कर सकीं—उन्होंने अंग्रेजी साम्राज्य के मन में डर उतार दिया।

राम सिंह पठानिया केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि हिमालय का वह तूफ़ान थे जिसने पराधीनता की चुप्पी को चीरकर स्वतंत्रता की पहली गंभीर गूँज पैदा की।उनकी वीरगाथा हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता केवल तलवार से नहीं, बल्कि साहस, स्वाभिमान और अन्याय को चुनौती देने की हिम्मत से मिलती है।आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस लेते हैं, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस मिट्टी में ऐसे भी वीर जन्मे थे, जिन्होंने चंद साथियों और सीमित संसाधनों के बावजूद एक साम्राज्य को चुनौती देने का साहस किया।

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