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नूरपुर के नामकरण पर उठी जनभावना और ऐतिहासिक चेतना का नवोदय

RamParkash Vats
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नूरपुर को “शहीद वज़ीर राम सिंह पठानिया नगर” नाम देने की मांग—एक भावनात्मक नहीं, ऐतिहासिक न्याय की पुकार

कांगड़ा की जनता की आवाज़ अब धीमी गुहार नहीं रही, यह एक प्रबल संकल्प में बदल चुकी है। नूरपुर के लोगों में यह भावना गहरी जड़ें जमा चुकी है कि क्षेत्र को उसके अपने महानायक—बाज़ीर राम सिंह पठानिया—की पहचान से जोड़ा जाए। जनता का यह आग्रह केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक न्याय का वह अधूरा अध्याय है, जिसे अब पूरा किया जाना समय की मांग है।आज जब देश अपने नायकों की विरासतों को पुनर्जीवित करने की दिशा में निर्णायक कदम उठा रहा है, तब कांगड़ा की यह मांग बिल्कुल स्वाभाविक और सार्थक प्रतीत होती है। वीर शहीद वज़ीर राम सिंह पठानिया—वह नाम, जिसने अंग्रेजी साम्राज्य को चुनौती दी, जिसने साहस, नेतृत्व और मातृभूमि-भक्ति का ऐसा उदाहरण स्थापित किया, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ सदियों तक याद रखेंगी।और इसी संदेश को जन-जन तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया है—आईडिया ऑफ़ भारत फाउंडेशन ने।

नूरपुर का नाम बदलकर “शहीद वज़ीर राम सिंह पठानिया नगर” किया जाए।

यह केवल एक नाम परिवर्तन का प्रस्ताव नहीं, बल्कि एक भूली-बिसरी शौर्यगाथा को पुनर्प्रतिष्ठित करने का राष्ट्रीय प्रयास है।
पत्रकार वार्ता में संगठन के अध्यक्ष राहुल शर्मा ने बिल्कुल सही कहा—“यह अभियान सिर्फ नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि हमारे गौरव की पुनर्स्थापना है।”दरअसल, नूरपुर की धरती ने एक ऐसे रणबांकुरे को जन्म दिया, जिसकी वीरता की चर्चा अंग्रेज़ों की सेना तक को विचलित कर देती थी। उसके बलिदान की गूंज आज भी इतिहास की पंक्तियों में जीवंत है, लेकिन दुर्भाग्यवश स्थानीय पहचान में वह चमक उतनी दिखाई नहीं देती। यह विडंबना ही है कि जिस भूमि ने इस अमर वीर को जन्म दिया, उसे अब तक उसके नाम से सम्मानित नहीं किया गया।

कांगड़ा की जनता इस विसंगति को समाप्त करना चाहती है—और यही मांग अब एक व्यापक जनान्दोलन में बदल रही है।
आईडिया ऑफ़ भारत फाउंडेशन का यह अभियान जनता की भावना का प्रतिबिंब है, कोई राजनीतिक स्टंट नहीं। लोग मानते हैं कि नूरपुर का नाम बदलकर “शहीद वज़ीर राम सिंह पठानिया नगर” करना केवल सम्मान नहीं, बल्कि नयी पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्थायी स्रोत बनेगा।एक ऐसे दौर में जब इतिहास को सही संदर्भों में स्थापित करना आवश्यक है, तब यह मांग और भी प्रासंगिक हो जाती है। नाम बदलना कोई औपचारिक सरकारी प्रक्रिया भर नहीं—यह स्मृति को पुनर्जीवित करने का माध्यम है। यह वीरगाथा को भविष्य की मानसिकता में रोपने का साधन है। यह उस प्रतिरोध की याद है, जिसे कभी मिटा देने की कोशिश की गई थी।

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