नवनिर्वाचित पंचायतों के सामने पहली चुनौती—पंचायत घर का अभाव
गठन पहले, सुविधा बाद में! नई पंचायतों की जमीनी हकीकत
भरमाड़ 29/05/2026:संपादक न्यूज इंडिया आजतक
हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा बड़ी पंचायतों के विभाजन के बाद अस्तित्व में आई नई पंचायतों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब पंचायत भवन की बनकर उभरी है। सरकार ने प्रशासनिक सुविधा और स्थानीय विकास को गति देने के उद्देश्य से नई पंचायतों का गठन तो कर दिया, लेकिन गठन से पहले मूलभूत सुविधाओं की व्यवस्था पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। परिणामस्वरूप नवनिर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह खड़ा हो गया है कि आखिर पंचायत का संचालन होगा कहां?
न्यूज इंडिया आजतक के संपादक द्वारा क्षेत्र की नवनिर्वाचित पंचायतों का दौरा कर प्रधानों और उपप्रधानों से बातचीत की गई। बातचीत में एक ही चिंता बार-बार सामने आई—“पंचायत का काम शुरू तो कर देंगे, लेकिन बैठेंगे कहां?”
नई पंचायतों में न तो पंचायत घर है, न कार्यालय, न रिकॉर्ड रखने की सुरक्षित व्यवस्था और न ही बैठकों के लिए कोई निर्धारित स्थान। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पंचायतों की बैठकें खुले आसमान के नीचे होंगी? क्या गांव के किसी निजी भवन, स्कूल परिसर या अस्थायी स्थान से पंचायत का काम चलाया जाएगा?
नवनिर्वाचित प्रतिनिधियों का कहना है कि जनता ने विकास की उम्मीद से उन्हें चुना है, लेकिन शुरुआत ही संसाधनों के अभाव से हो रही है। पंचायत के महत्वपूर्ण दस्तावेज, बैठकों का संचालन, शिकायत निवारण, सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन—ये सभी कार्य बिना भवन के बड़ी चुनौती साबित होंगे।
विडम्बना यह है कि सरकार ने नई पंचायतों के गठन की अधिसूचना तो जारी कर दी, लेकिन यह नहीं सोचा कि इन पंचायतों का प्रशासनिक ढांचा कैसे खड़ा होगा। पंचायत घर केवल एक भवन नहीं होता, बल्कि ग्रामीण लोकतंत्र का केंद्र होता है, जहां विकास की योजनाएं बनती हैं और जनसमस्याओं का समाधान निकलता है।
अब देखना यह होगा कि सरकार नवनिर्वाचित पंचायतों की इस मूलभूत समस्या को कितनी गंभीरता से लेती है। क्योंकि सवाल केवल भवन का नहीं, बल्कि ग्रामीण प्रशासन को सुचारु रूप से चलाने का है। अन्यथा नई पंचायतें बनने का उद्देश्य शुरुआत में ही अधूरा नजर आने लगेगा।

