न्यूज़ इंडिया आजतकडाट काम कार्यालय भरमाड (KANGRA.H.P.) -संपादक राम प्रकाश वत्स
हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा मेधावी विद्यार्थियों को इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स (लैपटॉप या टैबलेट) देने की योजना में किया गया ताज़ा संशोधन सिर्फ एक शैक्षिक निर्णय नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संकेत़ भी है—और यह संकेत गहरी रणनीति की ओर इशारा करता है। सरकार ने ऐलान किया है कि अब यह लाभ सिर्फ सरकारी स्कूलों के मेधावी विद्यार्थियों को ही दिया जाएगा, जबकि निजी स्कूलों के छात्र योजना से बाहर कर दिए गए हैं। तीन साल से लंबित योजना में लगभग 9 करोड़ रुपये खर्च होंगे और दिसंबर में कूपन वितरण प्रस्तावित है।
पहली नज़र में यह कदम सरकारी स्कूलों को प्रोत्साहन देने का प्रतीक दिखता है, लेकिन राजनीति का अर्थशास्त्र कुछ और कहानी कहता है। हिमाचल में सरकारी स्कूलों की संख्या और उनमें नामांकित छात्रों की तादाद निजी स्कूलों से कहीं ज़्यादा है। सरल शब्दों में—ज़्यादा लाभार्थी, ज़्यादा राजनीतिक संदेश। यह कदम आगामी चुनावों के राजनीतिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए भी देखा जा सकता है।
राजकीय विद्यालयों के पक्ष में यह निर्णय कई स्तरों पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। वर्षों से सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या लगातार घट रही है और पिछले 14 वर्षों में बड़ी संख्या में पाठशालाएँ बंद हुई हैं, जो शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है। अब जब सरकार ने मेधावी विद्यार्थियों को लैपटॉप या टैबलेट कूपन का लाभ केवल सरकारी स्कूलों तक सीमित किया है, तो यह कदम अभिभावकों को बच्चों को निजी की बजाय सरकारी स्कूलों में प्रवेश दिलाने के लिए प्रेरित कर सकता है। इससे सरकारी स्कूलों की छवि और प्रतिस्पर्धात्मकता दोनों मजबूत होंगी। डिजिटल संसाधन मिलने से अध्ययन की गुणवत्ता बढ़ेगी, शिक्षक–विद्यार्थी प्रदर्शन सुधरेगा, और शिक्षा का आधार तकनीक से जुड़ेगा। कुल मिलाकर, यह योजना न सिर्फ मेधावियों के सम्मान का माध्यम है, बल्कि सरकारी स्कूलों में नए जीवन का संचार करने, बंद होते संस्थानों को बचाने और शिक्षा के सरकारी ढांचे को फिर से मजबूत करने का एक रणनीतिक प्रयास भी है।
क्यों किया गया यह बदलाव…….?
सुक्खू सरकार ने स्वयं गैजेट खरीदने की बजाय कूपन प्रणाली लागू की है। यह व्यवस्था राजनीतिक रूप से “पारदर्शिता” दिखाने के लिए कारगर है—सरकार खरीद नहीं कर रही, सिर्फ सहायता दे रही है। इससे किसी ख़ास कंपनी को सरकारी फ़ायदा पहुंचाने या खरीद प्रक्रिया में अनियमितता के आरोपों से भी बचाव हो जाता है।ऊपर से—SC/ST मेधावियों को प्राथमिकता—यह संदेश सामाजिक न्याय, वंचित वर्ग और संवैधानिक समानता के राजनीतिक दायरे में सीधे जाता है। यह निर्णय सामाजिक रूप से मजबूत और राजनीतिक रूप से लाभकारी दोनों है।
निजी स्कूल क्यों बाहर?
यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक बहस तेज़ होती है।निजी स्कूलों के विद्यार्थी भी राज्य बोर्ड की परीक्षा देते हैं, टॉपर भी वहीं से निकलते हैं, मेधावी भी वहीं हैं/फिर बाहर क्यों?सरकार का तर्क यह हो सकता है कि निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अपेक्षाकृत सक्षम परिवारों से आते हैं और उन्हें सरकारी सहायता की आवश्यकता कम है। पर सच यह भी है कि निजी स्कूलों में हजारों विद्यार्थी आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं जो फीस चुकाते-चुकाते ही थक जाते हैं। उन्हें योजना से बाहर कर देना “भेदभाव” की बहस को जन्म देगा।यानी राजनीतिक रूप से सरकार ने एक बड़े समूह को लाभ दिया, लेकिन एक अन्य प्रभावशाली, मध्यमवर्गीय वर्ग को नाराज़ करने का जोखिम भी खड़ा कर दिया।
पुरानी सरकारें और नई राजनीति
यह योजना 2007 में धूमल सरकार ने शुरू की, वीरभद्र सरकार ने विस्तार दिया, जयराम सरकार इसे बंद करने और जारी रखने की दुविधा में रही, और सुक्खू सरकार ने इसमें “तकनीकी और राजनीतिक” बदलाव कर दिया।इससे एक बात साफ होती है—योजना केवल शिक्षा का माध्यम नहीं, सत्ता परिवर्तन के साथ राजनीतिक मार्केटिंग का ब्रांड भी बन चुकी है।पहले सरकार लैपटॉप खरीदकर देती थी—अब कूपन देगी। इसका मतलब यह हुआ कि सरकार सीधे खरीद से बचकर विवाद-मुक्त रास्ता चुन रही है। यह निर्णय रणनीतिक भी है और सुरक्षित भी।
हिमाचल सरकार की संशोधित गैजेट कूपन योजना निश्चित रूप से सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों के डिजिटल सशक्तिकरण की दिशा में कदम है, लेकिन सवाल यह भी बना हुआ है कि क्या मेधा सरकारी और निजी स्कूलों में विभाजित हो सकती है? राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह निर्णय अधिक लाभार्थियों तक संदेश पहुँचाने, सामाजिक न्याय की प्राथमिकता दिखाने और पारदर्शिता की छवि पेश करने का अवसर देता है। सरकारी स्कूलों के मेधावियों को सम्मान मिला और निजी स्कूलों को संकेत—यानी शिक्षा नीति के साथ राजनीतिक समीकरण भी साध लिए गए। कुल मिलाकर, योजना उपयोगी है, पर इसके पीछे राजनीतिक गणित उतना ही मजबूत है जितना कि डिजिटल सुविधा का दावा।

