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प्लोहड़ा में “प्रधान दंगल” का फैसला: भाजपा मंडल अध्यक्ष ने कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष को हराकर जीती साख की जंग

RamParkash Vats
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JAWALI/OFFICE REPORTER DR NK SHARMA

जवाली की प्लोहड़ा पंचायत में इस बार प्रधान पद का चुनाव महज पंचायत का चुनाव नहीं था, बल्कि दो राजनीतिक अध्यक्षों की प्रतिष्ठा का अखाड़ा बन गया था। एक तरफ भाजपा ने अपने मंडल अध्यक्ष डॉ. राजिंदर सिंह को मैदान में उतारा, तो दूसरी ओर कांग्रेस ने ब्लॉक अध्यक्ष चैन सिंह पर दांव खेला। ऐसे में पंचायत का चुनाव अचानक “प्रधान दंगल” में तब्दील हो गया, जहां लड़ाई सिर्फ वोटों की नहीं बल्कि राजनीतिक साख की भी थी।

पंचायती राज चुनाव के अंतिम चरण में प्लोहड़ा पंचायत की यह सीट पूरे जवाली क्षेत्र की सबसे चर्चित हॉट सीट बन गई। गांव की चौपालों से लेकर चाय की दुकानों तक एक ही चर्चा थी—“हार चाहे किसी उम्मीदवार की हो, लेकिन असर सीधे पार्टी के वर्चस्व पर पड़ेगा।”भाजपा की ओर से नेता संजय गुलेरिया ने मोर्चा संभाला, जबकि कांग्रेस के पक्ष में मंत्री चौधरी चन्द्र कुमार ने खुलकर समर्थन मांगा। दोनों दलों ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना दिया था। मानो पंचायत नहीं, बल्कि राजनीतिक ताकत का सेमीफाइनल खेला जा रहा हो।

राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा रही कि भाजपा समर्थित डॉ. राजिंदर सिंह को रोकने के लिए विरोधियों ने कई राजनीतिक “चक्रव्यूह” रचे। समीकरण बनाए गए, रणनीतियां तैयार हुईं, लेकिन आखिरकार पंचायत की जनता ने अपनी अलग ही पटकथा लिख दी।मतदाताओं ने भावनाओं, नारों और बड़े नेताओं की अपील से ज्यादा काम को तरजीह दी। लोगों ने डॉ. राजिंदर सिंह के पूर्व प्रधान कार्यकाल में हुए विकास कार्यों को याद रखा और उसी आधार पर मतदान किया। नतीजा यह निकला कि भाजपा मंडल अध्यक्ष ने कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष को शिकस्त देते हुए प्रधान पद की बाजी अपने नाम कर ली।

चुनाव परिणाम आने के बाद पंचायत में एक ही चर्चा सुनने को मिली—“यह लोकतंत्र है, काम नहीं तो वोट नहीं।” लोगों ने साफ संदेश दिया कि पंचायत स्तर की राजनीति में पार्टी से ज्यादा विकास और जनसंपर्क मायने रखता है।प्लोहड़ा पंचायत का यह चुनाव अब सिर्फ एक पंचायत की जीत-हार नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे दो राजनीतिक अध्यक्षों के बीच हुए प्रतिष्ठा युद्ध के रूप में देखा जा रहा है। इस नतीजे ने यह भी साबित कर दिया कि पंचायत चुनावों में अंतिम फैसला जनता करती है, और जनता जब ठान ले तो बड़े-बड़े राजनीतिक समीकरण भी धरे के धरे रह जाते हैं।

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