संपादकीय ,चिंतन, मंथन और विश्लेषण: न्यूज़ इंडिया आजतक सपादक राम प्रकाश वत्स
यह कैसा विकास, जिसमें सड़कें प्रगति की राह नहीं, मौत की पटरियाँ बन गईं?
भारत में दुर्घटनाओं का बढ़ता आँकड़ा आज सिर्फ चिंता नहीं, राष्ट्रीय त्रासदी का रूप ले चुका है। शराब के नशे में धुत्त चालक अपने और दूसरों के जीवन से खिलवाड़ कर रहे हैं। एक सेकंड की लापरवाही दर्जनों ज़िंदगियाँ लील लेती है, सैकड़ों परिवार बर्बाद हो जाते हैं—किसी की मौत, किसी का अपंग जीवन, किसी का उजड़ता घर। उधर, युवाओं में स्टंटबाज़ी का पागलपन मौत को खुला निमंत्रण है। बदले की भावना या सड़क पर वर्चस्व दिखाने की जिद्द ने कई बार सामूहिक हत्या जैसे हादसे कराए हैं। यह कैसा विकास, जिसमें सड़कें प्रगति की राह नहीं, मौत की पटरियाँ बन गईं?
विश्व में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों के मामले में भारत सबसे ऊपर है।यह किसी भी सभ्य राष्ट्र के लिए कलंक से कम नहीं। हर साल लाखों लोग सड़कों पर जान गंवाते हैं और करोड़ों घायल होकर जिंदगी भर के लिए बोझ बन जाते हैं। दुखद है कि यह खतरा अचानक नहीं आया, बल्कि वर्षों से चीख-चीख कर चेतावनी दे रहा है—फिर भी सरकार, सिस्टम और समाज तीनों ने इसे अनसुना कर दिया। देश की सड़कों की गुणवत्ता, संकेतों की अनुपस्थिति, पहाड़ी मोड़ों की ख़राब डिजाइन, स्ट्रीट लाइट की कमी—हर तरफ लापरवाही का ढेर है। कई जगह तो ऐसा लगता है कि वाहन नहीं, ड्राइविंग किस्मत कर रही है।
अगर सड़कें मौत का जाल हैं, तो ड्राइविंग लाइसेंस सिस्टम मौत का टिकट बांट रहा है। लाइसेंस बनवाना कौशल पर नहीं, जुगाड़ और प्रक्रिया की ढिलाई पर निर्भर हो गया है। हेलमेट और सीट बेल्ट लोगों के लिए सुरक्षा नहीं, पुलिस से बचने का औज़ार हैं। ओवरस्पीडिंग, ओवरलोडिंग, मोबाइल पर बातें, नशे में ड्राइविंग—ये अपराध नहीं, आम व्यवहार बन चुके हैं। ट्रैफिक पुलिस दिखते ही नियम याद आ जाते हैं और उसके हटते ही सब हवा में उड़ जाते हैं। स्कूलों में सड़क सुरक्षा शिक्षा नहीं, अभियान फ़ोटो से आगे नहीं बढ़ते। हादसे होते हैं, शोर मचता है, थोड़ी देर का दर्द, और फिर सब पहले जैसा। नतीजा—कुछ नहीं बदलता, मौत का कारवाँ चलता रहता है।
समाधान असंभव नहीं, केवल इच्छाशक्ति की कमी है। वैज्ञानिक तरीके से सड़कें बनें, ब्लैक स्पॉट सुधरें, कैमरे और मॉनिटरिंग बढ़े, लाइसेंस सिस्टम सख़्त हो, और हेलमेट-सीट बेल्ट पर जीरो टॉलरेंस लागू हो, तो मौतों में 50% कमी संभव है। ट्रैफिक शिक्षा स्कूल स्तर से अनिवार्य की जाए, और पहाड़ी व ग्रामीण इलाकों में सुरक्षित सड़क ढांचा विकसित हो। सार्वजनिक परिवहन मजबूत हो, तो निजी गाड़ियों का दबाव घटेगा। भारत चाँद पर उतर सकता है, विश्वस्तरीय तकनीक बना सकता है—तो सुरक्षित सड़कें क्यों नहीं? सवाल निर्माण का नहीं, प्राथमिकताओं का है। जब सड़कें ख़ून बहाने लगें, तो विकास खोखला साबित होता है। भारत को सिर्फ सड़कें नहीं, सुरक्षित सड़कें बनानी होंगी—ताकि सफर जीवन का हो, मौत का नहीं।

