“बेरोजगार शारीरिक शिक्षकों को अब तक बेहद सीमित नौकरियां ही मिलीं, सरकार की उपेक्षा से हजारों प्रशिक्षित युवा आज भी इंतजार में भटक रहे हैं।”
भरमाड़ न्यूज़ इंडिया आजतक कार्यालय /29/09/2025/ संपादक राम प्रकाश वत्स
शरीरिक शिक्षकों के जीवन के साथ खिलवाड़ और सरकारों का भेदभावपूर्ण रवैया: शिक्षा व्यवस्था किसी भी राज्य या देश की रीढ़ होती है। लेकिन जब शिक्षा व्यवस्था में असमानता और भेदभाव दिखाई दे, तो यह न केवल प्रशिक्षित युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ होता है बल्कि समाज की नई पीढ़ी को भी उसकी वास्तविक शिक्षा से वंचित कर देता है। ऐसा ही मामला शारीरिक शिक्षा (Physical Education) से जुड़ा है, जिसे लगातार अनदेखा किया गया है।
शारीरिक शिक्षा का महत्व:शारीरिक शिक्षा केवल खेल-कूद या व्यायाम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में अहम भूमिका निभाती है। शारीरिक रूप से सक्रिय और स्वस्थ विद्यार्थी ही मानसिक रूप से भी मजबूत रह पाते हैं। यही कारण है कि दुनिया भर में स्कूलों में पीटीआई (Physical Training Instructor) और पीईटी (Physical Education Teacher) को अनिवार्य रूप से नियुक्त किया जाता है।लेकिन हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में इसका महत्व केवल कागज़ी घोषणाओं तक ही सीमित है।
प्रशिक्षित युवाओं की उपेक्षा:2004 में जिस युवक ने शारीरिक शिक्षा का कोर्स किया था, वह 2025 तक बिना नियमित अभ्यास और प्रशिक्षण के आज के “स्टैंडर्ड” को कैसे पूरा कर सकता है?अगर इन युवाओं को नियमित अवसर दिए जाते, तो उनका कौशल और अनुभव समय के साथ और भी बेहतर हो सकता था। लेकिन सरकारों ने उन्हें बेरोजगारी और निराशा की ओर धकेल दिया।पीटीआई, बीपी.एड., एमपी.एड. जैसे उच्च स्तरीय कोर्स करने के बाद भी प्रशिक्षित शिक्षक दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं
सरकारों का दोहरा रवैया:बेरोजगार शिक्षकों का कहना है कि जब बात उनकी भर्ती की आती है, तो सरकारें “धन कोष खाली होने” और “प्रदेश पर कर्ज के बोझ” का रोना रोने लगती हैं।लेकिन यही सरकारें जब अपने लिए वेतन और भत्तों की बात करती हैं, तब यह आर्थिक संकट कहीं दिखाई नहीं देता।यह दोहरा रवैया उन युवाओं के लिए और अधिक पीड़ादायक है, जिन्होंने वर्षों तक मेहनत करके प्रशिक्षण प्राप्त किया है।
40 वर्षों से उपेक्षा की परंपरा :हिमाचल प्रदेश में पिछले 40 वर्षों से शारीरिक शिक्षकों की भर्ती लगभग नगण्य रही है।जहाँ शिक्षा विभाग में अन्य विषयों के शिक्षकों की भर्ती लगातार होती रही, वहीं शारीरिक शिक्षा को कभी भी प्राथमिकता नहीं दी गई।यह सीधी-सीधी उपेक्षा और अन्याय है, जिससे हजारों योग्य प्रशिक्षित युवा बेरोजगारी के दलदल में फंसे हुए हैं।
बैच वाइज नियुक्ति: एक सपना:प्रदेश में वर्षों से यह प्रणाली चली आ रही है कि बैच वाइज (Batch-wise) भर्तियां होंगी। लेकिन शारीरिक शिक्षकों के मामले में यह व्यवस्था केवल “कथनी” में है, “करनी” में नहीं।हर बैच के विद्यार्थी बेरोजगार होकर अगले बैच को अपनी जगह सौंप देते हैं, लेकिन नौकरी का अवसर किसी को नहीं मिलता।इस तरह प्रशिक्षित युवाओं के सपने अधूरे ही रह जाते हैं।
विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा की स्थिति:ज्यादातर विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा के नाम पर औपचारिकता निभाई जाती है।जहाँ पीटीआई नियुक्त नहीं हैं, वहाँ अन्य शिक्षकों से यह काम करवाया जाता है।इससे न तो विद्यार्थियों को सही प्रशिक्षण मिल पाता है और न ही खेलकूद और स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य पूरा हो पाता है।
बेरोजगार शिक्षकों की पीड़ा:बेरोजगार शारीरिक शिक्षक लगातार आवाज उठा रहे हैं कि उन्हें उचित अवसर दिया जाए।लेकिन सरकारें केवल आश्वासन देती हैं।आज स्थिति यह है कि हजारों प्रशिक्षित युवा या तो बेरोजगार बैठे हैं, या फिर मजबूरी में अन्य असंगत नौकरियों और मजदूरी तक कर रहे हैं।
परिणामस्वरूप सामाजिक और मानसिक संकट :प्रशिक्षित युवाओं में निराशा और हताशा बढ़ रही है।बेरोजगारी के कारण कई युवा अन्य क्षेत्रों में पलायन कर रहे हैं।शिक्षा प्रणाली में शारीरिक शिक्षा का महत्व लगभग समाप्त हो गया है।छात्र स्वस्थ जीवन और अनुशासन से जुड़ी सही शिक्षा से वंचित हो रहे हैं।
सरकारों से अपेक्षाएँ1. शारीरिक शिक्षा को पाठ्यक्रम का अहम हिस्सा बनाना होगा।
*पीटीआई और अन्य प्रशिक्षित शिक्षकों की नियमित भर्ती सुनिश्चित की जानी चाहिए।
*बैच वाइज भर्ती व्यवस्था को लागू करके लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहे युवाओं को अवसर देना होगा
*विद्यालयों में खेल और शारीरिक शिक्षा को केवल *“फॉर्मेलिटी” न मानकर अनिवार्य और गंभीर विषय के रूप में अपनाना होगा।
सरकारों को अपने दोहरे रवैये से बचकर युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करना चाहिए।शारीरिक शिक्षकों के जीवन और करियर के साथ हुआ खिलवाड़ केवल व्यक्तिगत नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों के साथ भी अन्याय है।आज जरूरत है कि सरकारें इस भेदभावपूर्ण रवैये को खत्म करके शारीरिक शिक्षा को वह सम्मान दें, जिसकी यह हकदार है।बेरोजगार युवाओं की आहें और संघर्ष व्यर्थ न जाएँ, इसके लिए नियुक्तियों में पारदर्शिता, नियमित अवसर और संवेदनशीलता लाना अनिवार्य है।अगर यह कदम आज नहीं उठाए गए, तो 2025 ही नहीं, बल्कि आने वाले दशकों में भी शारीरिक शिक्षा और उससे जुड़े शिक्षक अपने हक से वंचित रहेंगे।–

