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कर्ज के बोझ तले हिमाचल में 25 साल बाद सरकारी लॉटरी की वापसी, राजस्व बढ़ाने की कोशिश या सामाजिक जोखिम…?

RamParkash Vats
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शिमला,19 फरवरी 2026, राज्य ब्यूरो चीफ़ ‌हिमाचल की सियासत में एक बार फिर सरकारी लॉटरी चर्चा के केंद्र में है। भारी कर्ज और केंद्र से मिलने वाले राजस्व घाटा अनुदान (RDG) में कटौती के बीच हिमाचल प्रदेश की सरकार अब आय के नए रास्ते खोज रही है—और करीब 25 साल बाद लॉटरी की वापसी उसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
क्यों पड़ा यह कदम उठाना
? राज्य पर लगभग 1.04 लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज है। सीमित संसाधन, वेतन-पेंशन का दबाव और विकास योजनाओं की जरूरत—इन सबके बीच सरकार को अतिरिक्त राजस्व की तलाश है। अनुमान है कि लॉटरी से सालाना 75 से 100 करोड़ रुपये तक की आय हो सकती है। सवाल यह है कि क्या यह राशि राज्य की वित्तीय सेहत सुधारने के लिए पर्याप्त होगी, या यह केवल अस्थायी राहत साबित होगी?
नियम तय करेगी मंत्रिमंडलीय उप-समिति:सरकार ने उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान की अध्यक्षता में एक उप-समिति बनाई है। इसमें अनिरुद्ध सिंह और राजेश धर्माणी सदस्य हैं। समिति को एक माह में पारदर्शी संचालन के लिए नियम और निविदा दस्तावेज तैयार करने हैं। इससे संकेत मिलता है कि सरकार इस बार लॉटरी को नियंत्रित और जवाबदेह ढांचे में चलाना चाहती है।
बजट सत्र में आ सकता है विधेयक:18 मार्च से शुरू होने वाले विधानसभा बजट सत्र में नया विधेयक लाया जा सकता है। यदि सदन से मंजूरी मिलती है, तो लॉटरी की आधिकारिक वापसी तय मानी जाएगी।
1999 में क्यों लगी थी रोक?वर्ष 1999 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की सरकार ने सामाजिक दुष्प्रभावों—विशेषकर युवाओं पर पड़ने वाले असर—को देखते हुए लॉटरी पर प्रतिबंध लगा दिया था। अब मौजूदा मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में सरकार ने आर्थिक मजबूरी को प्राथमिकता दी है।
बड़ा सवाल
राजस्व बनाम सामाजिक प्रभाव—यही असली बहस है। क्या आर्थिक संकट से निपटने के लिए लॉटरी सही रास्ता है, या इससे सामाजिक चुनौतियां बढ़ेंगी? आने वाले बजट सत्र में यह मुद्दा केवल आर्थिक नहीं, नैतिक और सामाजिक विमर्श का भी केंद्र बनेगा।

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