चिंतन, मंथन और विश्लेषण संपादकीय लेख : राम प्रकाश वत्स
19 फरवरी को हिमाचल प्रदेश की राजनीति आर्थिक मुद्दों को लेकर फिर गर्म रही। भाजपा और कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के बीच आरोप–प्रत्यारोप के तीखे बाण चले, परंतु इन बयानों के पीछे छिपे वास्तविक प्रश्न पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता है—आखिर प्रदेश की आर्थिक स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है?
भाजपा का आरोप है कि वर्तमान सरकार वित्तीय कुप्रबंधन से जूझ रही है, जबकि कांग्रेस पूर्व सरकार की नीतियों को संकट की जड़ बताती है। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर और मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के बीच यह बहस अब राजनीतिक सीमाओं से आगे बढ़कर जनचिंता का विषय बन चुकी है।
भारी करों का बोझ आम नागरिक महसूस कर रहा है। विभिन्न विभागों में कर्मचारियों के बीच असुरक्षा और वेतन संबंधी आशंकाएं बढ़ रही हैं। रोजगार सृजन की रफ्तार भी अपेक्षाकृत धीमी दिखाई देती है। ऐसे में केवल दोषारोपण से समाधान नहीं निकलेगा।
जरूरत है पारदर्शी वित्तीय रोडमैप, व्यय नियंत्रण, और दीर्घकालिक राजस्व रणनीति की। प्रदेश की अर्थव्यवस्था राजनीतिक वाकयुद्ध का विषय नहीं, बल्कि सामूहिक उत्तरदायित्व का प्रश्न है। अब समय है कि बहस से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाए जाएं।
हिमाचल प्रदेश की राजनीति इन दिनों राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) के मुद्दे पर तीखी बयानबाज़ी का अखाड़ा बनी हुई है। आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे राज्य में वित्तीय प्रबंधन का प्रश्न जितना गंभीर है, उतना ही राजनीतिक भी। एक ओर सत्तारूढ़ कांग्रेस इसे प्रदेश के संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई बता रही है, तो दूसरी ओर भाजपा इसे राज्य सरकार की वित्तीय विफलताओं से उपजा संकट करार दे रही है। सवाल यह है कि क्या यह विमर्श समाधान की दिशा में बढ़ रहा है या केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण का माध्यम बनता जा रहा है? मंथन, चिंतन और विश्लेषण के अन्तर्गत चर्चा करेंगे
भाजपा का दृष्टिकोण: प्रबंधन पर प्रश्न
नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि प्रदेशहित भाजपा के लिए सर्वोपरि है और केंद्र के समक्ष अपनी बात पार्टी स्वयं रखेगी। उनका आरोप है कि मुख्यमंत्री का रवैया टकरावपूर्ण है और केंद्र सरकार पर अनावश्यक आक्षेप लगाकर जनता का ध्यान वास्तविक वित्तीय कुप्रबंधन से हटाया जा रहा है।
भाजपा का तर्क है कि जब राज्य को राजस्व घाटा अनुदान मिल रहा था, तब भी सरकार वित्तीय संकट की बात कर रही थी। ऐसे में यदि आरडीजी बंद हुई है, तो राज्य सरकार को अपने संसाधनों के समुचित प्रबंधन और व्यय नियंत्रण की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए। भाजपा यह भी दावा कर रही है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने हिमाचल को पूर्व की तुलना में कई गुना अधिक सहायता दी है।
यह दृष्टिकोण वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता की मांग करता है, परंतु इसके साथ यह प्रश्न भी जुड़ा है कि क्या केंद्र और राज्य के बीच संवाद का स्वर सहयोगी है या प्रतिस्पर्धी?
कांग्रेस का प्रत्युत्तर: अधिकार की लड़ाई
राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने भाजपा पर प्रदेश विरोधी राजनीति का आरोप लगाते हुए कहा कि राजस्व घाटा अनुदान कोई खैरात नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है। उनका हवाला है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 275(1) के अंतर्गत विशेष श्रेणी और भौगोलिक दृष्टि से चुनौतीपूर्ण राज्यों को यह सहायता दी जाती रही है।
कांग्रेस का आरोप है कि पूर्व भाजपा सरकार को लगभग 70 हजार करोड़ रुपये की अतिरिक्त धनराशि प्राप्त हुई, फिर भी राज्य पर भारी कर्ज और देनदारियों का बोझ छोड़ा गया। वर्तमान सरकार का कहना है कि सीमित अनुदान और बढ़ते वित्तीय दायित्वों के बीच विकास और कल्याणकारी योजनाओं को संतुलित रखना चुनौतीपूर्ण है।
यह तर्क संवैधानिक प्रावधानों और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर आधारित है, किंतु आलोचक पूछते हैं कि क्या केवल पूर्व सरकार को दोष देना वर्तमान समस्याओं का पर्याप्त उत्तर है?
आर्थिक यथार्थ: राजनीति से परे
हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य के लिए राजस्व घाटा अनुदान केवल वित्तीय सहायता नहीं, बल्कि विकास की आधारशिला रहा है। सीमित औद्योगिक आधार, भौगोलिक बाधाएँ और आपदा जोखिम राज्य के व्यय को स्वाभाविक रूप से बढ़ाते हैं। ऐसे में आरडीजी का बंद होना या कम होना स्वाभाविक रूप से दबाव बढ़ाता है।
परंतु समान रूप से यह भी सत्य है कि दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता केवल अनुदानों पर निर्भर नहीं रह सकती। कर संग्रह की क्षमता, व्यय में पारदर्शिता, लोक-लुभावन घोषणाओं पर नियंत्रण और राजकोषीय अनुशासन—ये सभी तत्व राज्य की आर्थिक मजबूती के लिए अनिवार्य हैं।
निष्कर्ष: समाधान की राह
वर्तमान परिदृश्य में आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति प्रदेश की जनता को आश्वस्त नहीं कर सकती। आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र और राज्य के बीच संवाद टकराव से ऊपर उठकर सहयोग की दिशा में बढ़े। विपक्ष का दायित्व है कि वह रचनात्मक सुझाव दे, और सत्तारूढ़ दल का दायित्व है कि वह पारदर्शी वित्तीय रोडमैप प्रस्तुत करे।
हिमाचल की अर्थव्यवस्था किसी एक दल की नहीं, बल्कि समूचे प्रदेश की साझी जिम्मेदारी है। यदि राजनीतिक दल इसे चुनावी मुद्दे से आगे बढ़ाकर आर्थिक सुधार का अवसर बना सकें, तभी वास्तविक समाधान संभव

