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संपादकीय विश्लेषण मंथन और चिंतन:सरकारी स्कूलों से घटते भरोसे के कारणों की पड़ताल जरूरी”

RamParkash Vats
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, शिक्षा विभाग और शिक्षा मंत्रालय को सर्वो करवाना चाहिए कि पाठशालाओं में छात्राओं की कमी क्यों हो रही है लोग सरकारी स्कूलों से क्या उपेक्षा करते हैं“सरकारी स्कूलों से घटते भरोसे के कारणों की पड़ताल जरूरी है


शिक्षा विभाग और शिक्षा मंत्रालय को गहन विश्लेषण के साथ यह समझने की आवश्यकता है कि आखिर सरकारी पाठशालाओं में बच्चों की संख्या घटने के पीछे मूल कारण क्या हैं। अभिभावक जब अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में भेजना पसंद करते हैं तो इसके पीछे कहीं न कहीं सरकारी स्कूलों की घटती गुणवत्ता, संसाधनों की कमी, जवाबदेही का अभाव और शिक्षकों की कार्यप्रणाली से असंतोष जैसे बड़े कारण छिपे हो सकते हैं। यदि लोगों का विश्वास सरकारी स्कूलों से डगमगाया है तो यह केवल सामाजिक रूढ़ि नहीं, बल्कि व्यवस्था में मौजूद खामियों की ओर इशारा करता है। इन खामियों को पहचानना, उनकी जड़ तक जाना और ठोस सुधारात्मक कदम उठाना शिक्षा विभाग का दायित्व है ताकि शिक्षा सबके लिए समान रूप से आकर्षक और गुणवत्तापूर्ण बन सके।

हिमाचल प्रदेश में सरकारी स्कूलों के बंद होने और बच्चों के शिक्षा से दूर होने की चिंता लगातार बढ़ रही है। यह केवल शिक्षा विभाग की समस्या नहीं, बल्कि समाज और शासन दोनों के लिए गहरी चुनौती है। सरकारी नीतियों में बार-बार के बदलाव, अभिभावकों की प्राथमिकताओं में परिवर्तन, शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट और ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती ड्रॉपआउट दर इस संकट की मूल वजहें हैं।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए शिक्षा मंत्रालय को ठोस और कठोर निर्णय लेने होंगे। सबसे बड़ा सुधार यही हो सकता है कि मुख्यमंत्री से लेकर पंचायत स्तर के नेताओं और सरकारी कर्मचारियों तक—सभी के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाना अनिवार्य किया जाए। इससे शिक्षा प्रणाली पर जिम्मेदारी और पारदर्शिता बढ़ेगी, और आमजन का सरकारी स्कूलों पर विश्वास भी लौटेगा।

सुरक्षा और पहुंच के लिहाज से स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए मिनी वाहन चलाना अत्यंत उपयोगी कदम होगा। दूरदराज़ और पहाड़ी क्षेत्रों में विशेषकर यह सुविधा ड्रॉपआउट दर को कम कर सकती है। केवल लैपटॉप बांटने से शिक्षा में सुधार नहीं होगा; असली सुधार तब होगा जब हर स्कूल में विशेष कंप्यूटर रूम बने और रोज़ाना एक पीरियड केवल डिजिटल शिक्षा को समर्पित हो।

निजी स्कूलों की तर्ज पर पाठ्यक्रम प्रबंधन और अनुशासन भी जरूरी है। जहां प्राइवेट स्कूलों में बच्चे अगली कक्षा का पाठ पहले से पढ़ते हैं, वहीं सरकारी स्कूलों को भी नवाचार और अतिरिक्त मेहनत करनी होगी। साथ ही, बच्चों के दैनिक होमवर्क की नियमित जांच सुनिश्चित की जानी चाहिए।

यदि इन उपायों को ईमानदारी से लागू किया जाए तो सरकारी स्कूलों की साख पुनः स्थापित होगी और शिक्षा का असली लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंच सकेगा। शिक्षा केवल भवन और योजनाओं का नाम नहीं, बल्कि अनुशासन, गुणवत्ता और विश्वास की बुनियाद है।

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