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पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार के कमजोर पड़ने के पीछे बढ़ता आत्मविश्वास, तुष्टिकरण की राजनीति, घुसपैठ के आरोप, जनता का घटता विश्वास और आंतरिक संगठनात्मक असंतोष प्रमुख कारण बनते दिखाई दे रहे

RamParkash Vats
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भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि -कोटि नमन न्यूज इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स

संपादक राम प्रकाश वत्स

पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से भावनाओं, वर्ग संघर्ष, क्षेत्रीय अस्मिता और वैचारिक टकराव का केंद्र रही है। कभी वामपंथ का गढ़ रहे इस राज्य में जब ममता बनर्जी और उनकी पार्टी( All India Trinamool Congress )ने सत्ता संभाली थी, तब जनता ने उन्हें परिवर्तन की उम्मीद के रूप में देखा था। “मां, माटी और मानुष” का नारा आम लोगों के दिल तक पहुंचा था। लेकिन समय के साथ वही सरकार अब कई राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियों से घिरती दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों की दृष्टि से देखा जाए तो पश्चिम बंगाल में टीएमसी सरकार के कमजोर पड़ने के पीछे कई ऐसे कारण हैं, जिन्होंने धीरे-धीरे जनता के विश्वास को प्रभावित किया। सबसे बड़ा कारण अत्यधिक आत्मविश्वास माना जा रहा है। लंबे समय तक सत्ता में बने रहने के बाद अक्सर राजनीतिक दल यह मान लेते हैं कि जनता का समर्थन स्थायी हो चुका है। यही स्थिति बंगाल में भी दिखाई दी। सत्ता के शीर्ष नेतृत्व और संगठन के भीतर यह भावना विकसित होने लगी कि विपक्ष उन्हें चुनौती नहीं दे सकता। यही आत्मविश्वास धीरे-धीरे अहंकार की छवि में बदलता गया।
दूसरा बड़ा कारण समाज के विभिन्न वर्गों में संतुलन बनाए रखने में कठिनाई रहा। विपक्ष लगातार यह आरोप लगाता रहा कि सरकार विशेष समुदाय की राजनीति पर अधिक निर्भर हो गई है। चाहे यह आरोप पूरी तरह सही हों या राजनीतिक रणनीति का हिस्सा, लेकिन इसका प्रभाव राज्य के दूसरे समुदायों पर जरूर पड़ा। कई क्षेत्रों में यह भावना बनने लगी कि सरकार सभी वर्गों को समान रूप से नहीं देख रही। राजनीति में धारणा ही सबसे बड़ी सच्चाई बन जाती है और यही धारणा धीरे-धीरे असंतोष में बदलती चली गई।
बांग्लादेशी घुसपैठ और सीमा सुरक्षा का
मुद्दा भी बंगाल की राजनीति का केंद्र बन गया। विपक्ष विशेषकर भाजपा ने लगातार यह मुद्दा उठाया कि राज्य में अवैध घुसपैठियों को संरक्षण दिया जा रहा है। भाजपा ने इसे केवल सुरक्षा का नहीं बल्कि सांस्कृतिक और जनसंख्या संतुलन का मुद्दा बनाकर प्रस्तुत किया। सीमावर्ती जिलों में यह प्रचार तेजी से फैला कि राज्य सरकार वोट बैंक की राजनीति के लिए बाहरी लोगों को महत्व दे रही है। इससे स्थानीय लोगों के भीतर असुरक्षा और बेचैनी का वातावरण पैदा हुआ।
निर्धन और ग्रामीण वर्गों के लिए चलाई गई योजनाओं ने शुरू में सरकार को मजबूत आधार दिया, लेकिन समय के साथ भ्रष्टाचार और कटमनी जैसे आरोपों ने उन योजनाओं की विश्वसनीयता को कमजोर कर दिया। जनता को यह महसूस होने लगा कि सरकारी योजनाओं का लाभ पूरी पारदर्शिता से नहीं पहुंच रहा। पंचायत स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के खिलाफ नाराजगी बढ़ने लगी। यही कारण था कि चुनावों के बाद कई स्थानों पर जनता का आक्रोश खुलकर सामने आया।
भाजपा ने टीएमसी की इन्हीं कमजोरियों को राजनीतिक हथियार बनाया। भाजपा ने बंगाल में राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और पहचान की राजनीति को मजबूत ढंग से आगे बढ़ाया। टीएमसी सरकार की हर कमजोरी को भाजपा ने जनता के सामने “दुखती रग” की तरह प्रस्तुत किया। राजनीतिक हिंसा, भ्रष्टाचार, घुसपैठ और तुष्टिकरण जैसे मुद्दों को लगातार उछाला गया। इससे भाजपा धीरे-धीरे बंगाल में एक मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित होती चली गई।
टीएमसी के भीतर बढ़ता आंतरिक असंतोष भी एक महत्वपूर्ण कारण बनता दिखाई दे रहा है। लंबे समय तक एक ही नेतृत्व के इर्द-गिर्द राजनीति घूमने से कई पुराने नेता स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगे। पार्टी के भीतर परिवारवाद और करीबी लोगों के बढ़ते प्रभाव की चर्चाओं ने भी संगठनात्मक असंतोष को जन्म दिया। जब किसी दल के कार्यकर्ता और नेता स्वयं को निर्णय प्रक्रिया से अलग महसूस करने लगते हैं, तब संगठन की जड़ें कमजोर होने लगती हैं।
राजनीतिक हिंसा और चुनावी टकराव की घटनाओं ने भी सरकार की छवि को प्रभावित किया। बंगाल में चुनावों के बाद जिस प्रकार हिंसा और प्रतिशोध की घटनाएं सामने आईं, उसने लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए। विपक्ष ने इसे जनता के आक्रोश का परिणाम बताया, जबकि सरकार ने इसे राजनीतिक साजिश कहा। लेकिन आम जनता के मन में भय और असुरक्षा का वातावरण बना, जिसने सरकार के प्रति विश्वास को कमजोर किया।
आज पश्चिम बंगाल की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। टीएमसी अब भी एक मजबूत राजनीतिक शक्ति है, लेकिन जनता के भीतर जो विश्वास कभी अटूट दिखाई देता था, उसमें धीरे-धीरे दरारें उभरती नजर आ रही हैं। किसी भी सरकार के लिए सबसे बड़ी पूंजी जनता का भरोसा होता है। जब वही भरोसा कमजोर होने लगे, तब सत्ता की नींव भी हिलने लगती है। बंगाल की राजनीति में यही बदलाव आने वाले समय की सबसे बड़ी कहानी बन सकता

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