{मंगलवार को शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर की अध्यक्षता में हुई विभागीय समीक्षा बैठक पर संपादकीय मंथन और चिंतन}
शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है। यह केवल पुस्तकीय ज्ञान देने का माध्यम नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य गढ़ने का आधार भी है। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि शिक्षा विभाग में अनुशासन, जवाबदेही और पारदर्शिता पर कोई समझौता न किया जाए। हाल ही में हुई विभागीय समीक्षा बैठक में लिए गए निर्णय इसी दिशा में एक ठोस कदम प्रतीत होते हैं।
प्रवक्ता के रूप में पदोन्नत हुए शिक्षकों को कार्यभार ग्रहण करने के लिए एक सप्ताह की समय-सीमा निर्धारित करना निश्चय ही अनुशासन कायम करने का संकेत है। शिक्षा मंत्री का यह कहना कि तय समयसीमा तक पदभार ग्रहण न करने वालों की पदोन्नति रद्द कर दी जाएगी और अवसर अगले पात्र उम्मीदवारों को दिया जाएगा, कार्यसंस्कृति सुधार की दिशा में आवश्यक कदम है। यह संदेश स्पष्ट है कि अब शिक्षा विभाग में लापरवाही या टालमटोल की गुंजाइश नहीं रहेगी।
बैठक में लिए गए निर्णय यह भी दर्शाते हैं कि सरकार केवल पदस्थापन और पदोन्नति तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता को भी गंभीरता से ले रही है। औचक निरीक्षण, छात्र संख्या के आधार पर विज्ञान और अन्य विषयों के शिक्षकों का युक्तिकरण, तथा नशे, हेराफेरी या पॉक्सो जैसे गंभीर मामलों में सख्त कार्रवाई का स्पष्ट निर्देश—ये सब संकेत करते हैं कि अब विभाग में ‘सख्ती के साथ सुधार’ की नीति लागू होगी।
विज्ञान विषय में घटते नामांकन पर चिंता व्यक्त करना और छात्रों को प्रोत्साहित करने के लिए सुविधाएं सुधारने का निर्णय स्वागतयोग्य है। यह शिक्षा व्यवस्था की एक बड़ी चुनौती है कि विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषयों से विद्यार्थी लगातार दूरी बना रहे हैं। इसे बदलने के लिए बुनियादी सुविधाओं और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण पर निवेश आवश्यक है।
निस्संदेह, अनुशासन और पारदर्शिता से ही शिक्षा विभाग में सुधार लाया जा सकता है। नशे की गिरफ्त में आए शिक्षकों या भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई, न केवल विभाग की छवि सुधारने के लिए बल्कि बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए भी अनिवार्य है। यदि इन निर्णयों को धरातल पर ईमानदारी से लागू किया जाता है, तो यह हिमाचल की शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा और नई ऊर्जा प्रदान कर सकता है।

