भारत के स्वतंत्र सैनानी मास्टर तारा सिंह

भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि-कोटि नमन संपादक राम प्रकाश वत्स
भारत की स्वतंत्रता, सिख अस्मिता और पंजाब की सांस्कृतिक पहचान के संघर्ष में यदि किसी योद्धा का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है, तो वह थे मास्टर तारा सिंह। वे केवल एक नेता नहीं, बल्कि सिंह गर्जना करने वाले ऐसे निर्भीक सेनानी थे जिन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण समाज, धर्म और राष्ट्र की सेवा को समर्पित कर दिया।24 जून 1885 को रावलपिंडी के हरयाल गाँव में जन्मे मास्टर तारा सिंह ने प्रारंभिक जीवन में शिक्षक के रूप में कार्य किया, इसी कारण लोग उन्हें सम्मानपूर्वक “मास्टर” कहने लगे। बाद में उन्होंने सिख धर्म अपनाया और खालसा पंथ की मर्यादा, सम्मान तथा अधिकारों की रक्षा के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया।ब्रिटिश शासन के अत्याचारों के विरुद्ध जब देशभर में स्वतंत्रता की ज्वाला धधक रही थी, तब मास्टर तारा सिंह पंजाब की धरती पर संघर्ष का प्रतीक बनकर उभरे। उन्होंने अकाली आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई तथा गुरुद्वारों को महंतों और अंग्रेजी प्रभाव से मुक्त कराने के लिए अथक संघर्ष किया। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के गठन और मजबूती में उनका योगदान ऐतिहासिक माना जाता है।भारत विभाजन के समय जब देश सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा था, तब मास्टर तारा सिंह ने निर्भीक होकर द्वि-राष्ट्र सिद्धांत का विरोध किया। लाहौर विधानसभा की सीढ़ियों पर कृपाण लहराकर “पाकिस्तान मुर्दाबाद” का नारा लगाने का उनका साहस आज भी इतिहास में अमर है। यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि भारत की एकता और पंजाब की आत्मा की रक्षा का उद्घोष था।स्वतंत्रता के बाद भी उनका संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। उन्होंने पंजाबी भाषा, संस्कृति और सिख पहचान की रक्षा के लिए “पंजाबी सूबा आंदोलन” का नेतृत्व किया। उनका मानना था कि भाषा और संस्कृति किसी समाज की आत्मा होती है, जिसकी रक्षा करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।मास्टर तारा सिंह का जीवन त्याग, साहस और अदम्य राष्ट्रभक्ति की अमर गाथा है। वे उन महान स्वतंत्रता सेनानियों में गिने जाते हैं जिन्होंने सत्ता नहीं, बल्कि समाज और धर्म की सेवा को अपना लक्ष्य बनाया। पंजाब और सिख समाज सदैव उनके ऋणी रहेंगे। 22 नवंबर 1967 को उनका निधन हुआ, किंतु उनका संघर्ष, उनका साहस और उनकी प्रेरणा आज भी करोड़ों भारतीयों के हृदय में जीवित है।

