Reading: किसान आंदोलन की सबसे कम उम्र की स्वतंत्रता सेनानी बचन कौर का संघर्ष और बलिदान आज भी प्रेरणास्रोत है।

किसान आंदोलन की सबसे कम उम्र की स्वतंत्रता सेनानी बचन कौर का संघर्ष और बलिदान आज भी प्रेरणास्रोत है।

RamParkash Vats
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भारत के स्वतंत्रता संग्राम सैनानी श्रीमती बचन कौर को कोटि कोटि नमन

भारत के स्वतंत्र सैनानी श्रीमती बचन कौर को कोटि कोटि नमन संपादक राम प्रकाश वत्स

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक वीरों और वीरांगनाओं ने अपने जीवन का बलिदान देकर देश को आज़ादी दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्हीं महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थीं श्रीमती बचन कौर जी, जिन्होंने कम आयु में ही देशभक्ति और संघर्ष का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जो आज भी प्रेरणादायक है।

श्रीमती बचन कौर का जन्म लाहौर के भंगली गांव, जो अब पाकिस्तान में स्थित है, में हुआ था। उनका परिवार देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत था। परिवार के सभी सदस्य स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े हुए थे और अंग्रेजी शासन के अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे। बचन कौर जी के पिता भी एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे। अंग्रेज सरकार ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। उस समय बचन कौर मात्र 13 वर्ष की थीं। इतनी छोटी आयु में पिता की गिरफ्तारी और परिवार पर हुए अत्याचारों ने उनके मन में अंग्रेजी हुकूमत के प्रति विद्रोह की भावना और भी प्रबल कर दी।

बचन कौर जी ने बचपन से ही देश सेवा का संकल्प ले लिया था। उन्होंने केवल अपने परिवार की पीड़ा को ही नहीं देखा, बल्कि देश के किसानों, मजदूरों और गरीबों की कठिनाइयों को भी महसूस किया। यही कारण था कि वर्ष 1939 में उन्होंने किसान मोर्चा में भाग लिया। उस समय देशभर में किसान अपने अधिकारों और अंग्रेजी सरकार की अन्यायपूर्ण नीतियों के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। बचन कौर जी ने इस आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आवाज बुलंद की।

किसान मोर्चा में भाग लेने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्होंने सात महीने और तीस दिन की कठोर कैद झेली। इतनी कम उम्र में जेल जाना और कठिन परिस्थितियों का सामना करना किसी सामान्य व्यक्ति के लिए आसान नहीं था, लेकिन बचन कौर जी ने साहस और धैर्य का परिचय दिया। वह किसान मोर्चा की सबसे कम उम्र की स्वतंत्रता सेनानी मानी जाती हैं। उनका यह त्याग और संघर्ष देश के इतिहास में विशेष स्थान रखता है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी उनके योगदान को भुलाया नहीं गया। भारत सरकार ने उनके अद्वितीय साहस और देशभक्ति को सम्मानित करते हुए 15 अगस्त 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi द्वारा उन्हें “ताम्र पत्र” प्रदान किया। यह सम्मान उन स्वतंत्रता सेनानियों को दिया गया था जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया था। यह उनके संघर्ष और बलिदान का राष्ट्रीय सम्मान था।

श्रीमती बचन कौर का जीवन त्याग, संघर्ष और देशभक्ति की अमर गाथा है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि देश सेवा के लिए उम्र नहीं, बल्कि साहस और समर्पण की आवश्यकता होती है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। भारत माता की इस वीर बेटी को देश सदैव श्रद्धा और सम्मान के साथ याद करेगा।

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