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संपादकीय मंथन और चिंतन : हिमाचल प्रदेश में सैर: आस्था, संस्कृति और सामूहिकता का पर्व

RamParkash Vats
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हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान उसकी जीवंत पर्व-परंपराओं, मेलों और देवधर्म में गहराई से रची-बसी है। पहाड़ों का समाज प्रकृति से जुड़कर जीता है, इसलिए यहाँ के त्योहार केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन की धड़कन हैं। इन पर्वों में सैर का स्थान विशिष्ट है। यह आश्विन संक्रांति का पर्व है, जो फसल कटाई, देवपूजन और सामाजिक मेलमिलाप का प्रतीक बनकर लोकजीवन को गहराई से प्रभावित करता है। ग्रामीण समाज में सैर केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोक-संस्कृति, पारिवारिक एकता और परंपरागत विश्वासों का समागम माना जाता है।


सैर पर्व आश्विन संक्रांति के अवसर पर मनाया जाता है। इस दिन वर्ष भर की मेहनत का प्रतिफल किसान को नई फसल के रूप में मिलता है। अतः सैर को कृतज्ञता पर्व भी कहा जाता है। देवताओं को नई फसल चढ़ाकर किसान आभार प्रकट करता है, साथ ही सैरी माता की पूजा की जाती है, जिन्हें समृद्धि और रक्षा की देवी माना गया है। हिमाचली लोक परंपराओं में यह दिन पवित्र इसलिए भी है कि संक्रांति का समय सूर्य की उत्तरायण-दक्षिणायण गति से जुड़ा है और इसे ऊर्जा-संक्रमण का क्षण माना जाता है।


ग्रामीण समाज में सैर से जुड़ी अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। लोकविश्वास है कि भादों माह के अंतिम दौर में जब वर्षा और प्राकृतिक असंतुलन चरम पर होता है, तो देवताओं और असुरों का संघर्ष चलता है। आश्विन संक्रांति पर इस संघर्ष का अंत होता है और धरती पर संतुलन एवं सुख-शांति की बहाली होती है। द्रंग क्षेत्र में यह मान्यता विशेष रूप से प्रचलित है कि इसी दिन देवताओं की विजय होती है और लोग सैर पर्व के माध्यम से इस गौरव को मनाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि सैर का स्वरूप केवल कृषि और ऋतुचक्र से नहीं, बल्कि दैवीय लोककथाओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।


सैर से एक दिन पूर्व ही घर-घर साफ–सफाई होती है। नई फसलों जैसे मक्का, कुट्टू, उड़द और फल-सब्जियों का संग्रह किया जाता है। त्योहार के दिन दूध-चावल, मक्के की रोटियाँ, कुट्टू के पकवान तथा मौसमी व्यंजन बनाकर देवताओं को अर्पित किए जाते हैं। विशेष रूप से दूब (हरियाली) और अखरोट सैर के अनुष्ठानों का प्रमुख हिस्सा हैं। दूब को दीर्घायु और अखरोट को समृद्धि का प्रतीक मानकर बुजुर्ग इसे कनिष्ठ पीढ़ी को आशीर्वादस्वरूप देते हैं। बहनें भाइयों को राखी समान धागा बांधती हैं और घर में पारिवारिक भोजन का आयोजन होता है।


हिमाचल प्रदेश की विविध भौगोलिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ सैर को अलग-अलग स्वरूप प्रदान करती हैं। कुल्लू और मंडी में यह देवसंस्कृति से गहरे जुड़ा है, जहाँ देवदार की शाखाओं और अनाज के दानों से विशेष पूजन होता है। शिमला और सोलन में इसे ग्रामीण मेले के रूप में भी मनाया जाता है, जबकि चंबा और सिरमौर में लोकगीतों और नृत्यों के साथ नई फसल को अर्पित करने की परंपरा है। हर क्षेत्र का अपना रंग है, परंतु मूल संदेश एक—कृतज्ञता, सामूहिकता और आस्था। यही सामाजिक शक्ति इसे कालातीत बनाती है।

यदि हिमाचल की लोक-संस्कृति को जीवंत बनाए रखना है तो सैर जैसे उत्सवों का संरक्षण आवश्यक है।

सरकार को चाहिए कि वह लोक-उत्सवों को सांस्कृतिक कैलेंडर में स्थान देकर इनके प्रचार-प्रसार के लिए कार्यक्रम आयोजित करे।

स्कूल-कॉलेज स्तर पर छात्रों को इन पर्वों से परिचित कराने की योजनाएँ बनें।

सांस्कृतिक संस्थाएँ लोकगीत, नाट्य और प्रदर्शनियों के माध्यम से इस परंपरा को आधुनिक मंच दें।

कांगड़ा की यह सैर न केवल फसल उत्सव है बल्कि सामाजिक एकता, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रतीक भी है। इसे जीवित रख


गौरतलब है कि आज जब शहरीकरण और बाज़ारवाद से पर्वों का स्वरूप बदल रहा है, तब सैर जैसे लोकपर्वों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। यदि ये परंपराएँ लुप्त होंगी, तो हमारी सांस्कृतिक पहचान खो जाएगी। सरकार को चाहिए कि इन्हें सांस्कृतिक कैलेंडर में शामिल कर विद्यालयों और महाविद्यालयों में लोकपर्वों पर विशेष आयोजन करवाए। वहीं समाज और परिवार की जिम्मेदारी है कि नई पीढ़ी को इस धरोहर से जोड़ें। सैर पर्व हमें यह सिखाता है कि संस्कृति ही पहचान है और पहचान का संरक्षण ही भविष्य की सबसे बड़ी पूँजी है। यह पर्व आस्था, संस्कृति और सामूहिकता का वह उत्सव है जो हिमाचल के जीवन को सदैव ऊर्जा और एकता से आलोकित करता रहेगा।

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