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सम्पादकीय विश्लेषण,मंथन और चिंतन : जातिवाद और सनातन धर्म : आत्मा पर लगा कलंक

RamParkash Vats
8 Min Read

सनातन धर्म, जिसे आज सामान्यतः “हिन्दू धर्म” कहा जाता है, मानव इतिहास की सबसे प्राचीन और निरन्तर प्रवाहित आस्था-धारा है। इसकी आध्यात्मिकता ने न केवल भारतीय उपमहाद्वीप बल्कि सम्पूर्ण विश्व को जीवन-दर्शन, कर्तव्य-निष्ठा और आत्मोन्नति का मार्ग दिखाया। “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” जैसे शाश्वत सूत्रों ने इसकी आत्मा को विश्वमानवता का प्रतीक बनाया। किन्तु दुःख की बात है कि समय के साथ इस धर्म में एक विकृति ने गहरी जड़ें जमा लीं—जातिवाद। यह विषबेल न केवल सामाजिक ढाँचे को खोखला करती रही बल्कि सनातन धर्म की उस आध्यात्मिक आत्मा पर भी प्रहार करती रही, जो समता और सर्वजनीनता का प्रतीक रही है।

इस सम्पादकीय विश्लेषण मंथन और चिंतन में हम जातिवाद के कारणों, उसके दुष्परिणामों, संतों व समाज-सुधारकों के प्रयासों और वर्तमान समय में इससे मुक्ति के उपायों पर गहराई से विचार करेंगे।

सनातन धर्म की नींव : सत्य, अहिंसा, सेवा, समता और आत्मा की एकता पर आधारित। उपनिषदों में स्पष्ट कहा गया है—“आत्मा वै सर्वेषां भूतानाम् अन्तरात्मा” यानी सभी प्राणियों में एक ही आत्मा विद्यमान है।

प्रारम्भिक वर्ण-व्यवस्था : समाज के संगठन हेतु कर्म आधारित चार वर्णों का ढाँचा—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। यह किसी की जन्मजात पहचान नहीं बल्कि कार्य-विभाजन था।

विकृति का जन्म : धीरे-धीरे वर्ण व्यवस्था कठोर होकर जन्म-आधारित जातिवाद में बदल गई। कर्म से प्रतिष्ठा पाने की जगह जन्म से ऊँच-नीच तय होने लगा।

यहाँ से शुरू हुआ वह आध्यात्मिक संकट, जिसने धर्म की सार्वभौमिकता को कमजोर कर दिया।

सनातन धर्म का मूल संदेश था“वसुधैव कुटुम्बकम्”। लेकिन जातिवाद ने समाज को टुकड़ों में बाँट दिया। एक ही परिवार, गाँव और धर्म के लोग जाति की दीवारों से अलग-थलग हो गए।

(ख) मानवता के सिद्धान्त के विपरीत

उपनिषदों से लेकर गीता तक, हर ग्रंथ कहता है कि आत्मा न जन्म से ऊँची-नीची होती है, न किसी जाति से। जातिवाद इस मूल शिक्षा का अपमान करता है।

(ग) धार्मिक मूल्यों का ह्रास

करुणा, समानता, सेवा और सत्य—ये सनातन धर्म के मूल मूल्य थे। जातिवाद ने इन्हें पीछे धकेलकर घृणा, अहंकार और दमन को जगह दी।

(घ) सामाजिक विघटन

जातिवाद के कारण शिक्षा, भूमि, मंदिर, जल-स्रोत और अवसरों तक पहुँच कुछ वर्गों के लिए सीमित कर दी गई। इससे समाज में अविश्वास और विद्रोह पैदा हुआ।

(ङ) आध्यात्मिक विकास में बाधा

मोक्ष का मार्ग सबके लिए समान रूप से खुला होना चाहिए, पर जातिवाद ने निम्न जातियों को धार्मिक अनुष्ठानों और शास्त्रज्ञान से दूर कर दिया। यह उनकी आत्मिक उन्नति में सबसे बड़ी बाधा बनी।

(च) धर्म की छवि पर आँच

जब जातिवाद के कारण अत्याचार, अस्पृश्यता और भेदभाव के समाचार दुनिया तक पहुँचे, तो सनातन धर्म की सार्वभौमिक छवि धूमिल हो गई। यही कारण है कि अनेक लोग अन्य धर्मों की ओर आकर्षित हुए।


संत कबीर : जाति-प्रथा को मूर्खता कहा—“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।”

रैदास : आत्मा की समानता और ‘बेगमपुरा’ का स्वप्न, जहाँ कोई ऊँच-नीच न हो।

नामदेव और तुकाराम : भक्ति को जाति की दीवार से परे बताया।

गुरु नानक : “मनुष्य एक है, जाति और मजहब की दीवारें कृत्रिम हैं।”

इन संतों ने भक्ति को लोकतांत्रिक बनाया और सामान्य जन को यह विश्वास दिया कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए न जाति की जरूरत है, न किसी मध्यस्थ की।


बौद्ध धर्म का उदय : बुद्ध ने करुणा और समानता का मार्ग दिखाया। बड़ी संख्या में शूद्रों और अछूतों ने जातिवाद से मुक्ति के लिए बौद्ध धर्म अपनाया।

इस्लाम और ईसाई धर्म की ओर आकर्षण : मध्यकाल में जब अस्पृश्यता और जातीय अत्याचार बढ़े, तब अनेक लोग इन धर्मों में शरण लेने लगे, क्योंकि वहाँ कम से कम सामाजिक समानता का वादा था।

आधुनिक काल : बाबा साहेब अंबेडकर ने कहा—“मैं हिन्दू धर्म में जन्मा हूँ, यह मेरे वश में नहीं था; पर मैं हिन्दू धर्म में मरूँगा नहीं।” उनका बौद्ध धर्म अपनाना इस बात का प्रमाण है कि जातिवाद ने सनातन धर्म के लाखों अनुयायियों को दूर कर दिया।


भक्ति आन्दोलन : समाज को बाँटने के बजाय जोड़ने का प्रयास।

आर्य समाज (स्वामी दयानंद) : वेदों की ओर लौटने और जाति की कठोरता को तोड़ने का प्रयास।

महात्मा गांधी : अस्पृश्यता को ‘हरिजन सेवा’ से बदलने का अभियान।

अम्बेडकर : जाति-उन्मूलन और सामाजिक न्याय की लड़ाई।

इन प्रयासों ने समाज में चेतना तो जगाई, लेकिन जातिवाद अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाया।


आज शिक्षा, राजनीति और अर्थव्यवस्था तक में जातिवाद अपनी गहरी छाप छोड़ता है।

राजनीति : चुनाव जातिगत समीकरणों पर लड़े जाते हैं।

शिक्षा : अभी भी कुछ जगहों पर जातिगत भेदभाव की घटनाएँ सामने आती हैं।

सामाजिक जीवन : विवाह, खान-पान और सामाजिक मेलजोल में जाति की दीवारें कायम हैं।

धर्मशास्त्र की पुनर्व्याख्या : ग्रंथों में जो समता और सार्वभौमिकता के सूत्र हैं, उन्हें सामने लाना।

शिक्षा और जागरूकता : विद्यालयों से लेकर मंदिरों तक, जातिवाद विरोधी शिक्षण और व्यवहार।

सामाजिक पहल : मंदिर, कुएँ, भोज, विवाह—हर क्षेत्र में समानता।

आध्यात्मिक सुधार : यह सन्देश देना कि मोक्ष सबका अधिकार है।

कानूनी दृढ़ता : जातिगत भेदभाव करने वालों पर सख्त कार्यवाही।

सनातन धर्म का भविष्य जातिवाद के उन्मूलन पर टिका है। यदि यह विषबेल बनी रही, तो धर्म की सार्वभौमिक आत्मा और अधिक क्षतिग्रस्त होगी। पर यदि समाज, संत, विद्वान और सरकार मिलकर इसे हटाने का प्रयास करें, तो न केवल धर्म अपनी मूल चमक को पुनः पा सकता है, बल्कि भारत फिर से विश्व को यह सन्देश दे सकता है कि—

“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।”

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