
न्यूज इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स
शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का हालिया शिखर सम्मेलन इस बार वैश्विक राजनीति के लिए असाधारण महत्व का केंद्र रहा। भारत, रूस और चीन की “महाशक्ति तिकड़ी” ने मिलकर जिस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, उसने न केवल अमेरिका की एकतरफा नीतियों को चुनौती दी बल्कि विश्व व्यवस्था में बहुध्रुवीयता की नई आहट भी दी है।

आज जब अमेरिका अपनी “ट्रेड वॉर” और टैरिफ नीतियों के जरिए वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल रहा है, तब यह तिकड़ी सहयोग और संतुलन का नया मॉडल प्रस्तुत कर रही है। इस समिट से निकलने वाले संदेश केवल एशिया तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका असर यूरोप, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका तक महसूस किया जा रहा है।
भारत के दृष्टिकोण से यह सम्मेलन विशेष महत्व रखता है। एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंच से साफ कर दिया कि कनेक्टिविटी और सहयोग तभी संभव है जब वह किसी राष्ट्र की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करे। यह संदेश अप्रत्यक्ष रूप से चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) पर भारत की सख्त आपत्ति को दर्शाता है। दूसरी ओर, मोदी-जिनपिंग वार्ता ने दोनों देशों के रिश्तों में तनाव के बाद एक नए संवाद का द्वार भी खोला।
भारत को इस समिट से तीन बड़े लाभ प्राप्त हुए। पहला, अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसे अपने सुरक्षा हितों के लिए स्पष्ट समर्थन मिला—जम्मू-कश्मीर में हालिया आतंकी हमले की SCO देशों ने निंदा की। दूसरा, भारत ने खुद को केवल “क्षेत्रीय भागीदार” नहीं, बल्कि एक वैश्विक शक्ति और निर्णायक आवाज के रूप में स्थापित किया। तीसरा, अमेरिकी टैरिफ नीतियों के विकल्प के रूप में भारत को रूस और चीन के साथ नए व्यापारिक अवसरों और रणनीतिक विकल्पों का द्वार मिला।
संपादकीय दृष्टि से कहा जा सकता है कि “महाशक्ति तिकड़ी” का यह समीकरण आने वाले समय में विश्व राजनीति का केंद्रबिंदु बनेगा। भारत, जो अब तक संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति का समर्थक रहा है, इस मंच से अपने हितों को और अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने में सफल हुआ है।
SCO का यह अध्याय भारत के लिए केवल कूटनीतिक जीत नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में एक निर्णायक भूमिका निभाने की शुरुआत है। अब चुनौती इस बात की होगी कि भारत इस अवसर को स्थायी रणनीति में बदलकर अपने दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों को किस प्रकार सुरक्षित करत

