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संपादकीय-समुद्र की लहरों पर भारत का बढ़ता सामर्थ्य: आत्मनिर्भर नौसेना से मजबूत होती प्रभूसता।

RamParkash Vats
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न्यूज इंडिया आजतक मुख्य संपादक राम प्रकाश वत्स

समुद्र अब केवल सीमाओं की रक्षा का क्षेत्र नहीं, बल्कि आर्थिक शक्ति, सामरिक प्रभाव और वैश्विक नेतृत्व का निर्णायक मंच बन चुका है। ऐसे समय में भारतीय नौसेना का बढ़ता सामर्थ्य केवल सैन्य उपलब्धि नहीं, बल्कि बदलते भारत के आत्मविश्वास की स्पष्ट अभिव्यक्ति है।भारत की भौगोलिक स्थिति ही ऐसी है कि उसकी सुरक्षा और समृद्धि का एक बड़ा हिस्सा समुद्र से जुड़ा हुआ है। हिंद महासागर में भारत की स्थिति उसे स्वाभाविक रूप से एक महत्वपूर्ण समुद्री शक्ति बनाती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को जिस राजनीतिक प्राथमिकता के साथ आगे बढ़ाया गया है, उसका प्रभाव नौसेना पर भी स्पष्ट दिखाई देता है। समुद्री शक्ति को केवल युद्ध की तैयारी के रूप में नहीं, बल्कि भारत की वैश्विक भूमिका के महत्वपूर्ण आधार के रूप में देखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य स्पष्ट है—भारत अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं के लिए दूसरों पर अत्यधिक निर्भर न रहे और आवश्यकता पड़ने पर अपने समुद्री हितों की रक्षा स्वयं करने में सक्षम हो।लेकिन मजबूत नौसेना का अर्थ केवल अधिक हथियार होना नहीं है। आधुनिक समुद्री युद्ध में सूचना, संचार, उपग्रह निगरानी, साइबर क्षमता, ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और सटीक लक्ष्यभेदी प्रणालियों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। इसलिए भारतीय नौसेना का भविष्य केवल बड़े जहाजों में नहीं, बल्कि समुद्र, आकाश, अंतरिक्ष और डिजिटल क्षेत्र के बीच मजबूत तालमेल में निहित है।भारत की समुद्री शक्ति का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी बढ़ती जिम्मेदारी है। भारत किसी क्षेत्रीय शक्ति के रूप में केवल अपनी सीमाओं तक सीमित रहने की नीति नहीं रखता। समुद्री सुरक्षा, मानवीय सहायता, आपदा राहत, समुद्री डकैती से मुकाबला और क्षेत्रीय सहयोग जैसे क्षेत्रों में भारतीय नौसेना की भूमिका भारत की जिम्मेदार समुद्री शक्ति की छवि को मजबूत करती है।यही कारण है कि आज भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में केवल एक सैन्य शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद सुरक्षा साझेदार के रूप में भी देखा जाता है। समुद्री मार्गों की सुरक्षा भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार से जुड़ा है। ऊर्जा आपूर्ति, कच्चा माल, निर्यात-आयात और वैश्विक आपूर्ति शृंखला—इन सभी की सुरक्षा में समुद्री स्थिरता की महत्वपूर्ण भूमिका है।भारत की बढ़ती नौसैनिक क्षमता का संदेश किसी देश के विरुद्ध आक्रामकता नहीं, बल्कि अपनी संप्रभुता की रक्षा और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक क्षमता का निर्माण होना चाहिए। मजबूत रक्षा व्यवस्था युद्ध को बढ़ावा देने के लिए नहीं, बल्कि युद्ध की संभावना को रोकने के लिए भी होती है। जिस देश के पास विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता होती है, उसके साथ रणनीतिक व्यवहार में भी दुनिया अधिक गंभीरता दिखाती है।फिर भी आत्मनिर्भरता की राह आसान नहीं है। आधुनिक रक्षा तकनीक अत्यंत महंगी और जटिल है। अनुसंधान, डिजाइन, परीक्षण, उत्पादन और रखरखाव—हर स्तर पर निरंतर निवेश की आवश्यकता है। केवल हथियार खरीद लेने से समुद्री शक्ति नहीं बनती। असली शक्ति तब आती है जब देश स्वयं डिजाइन कर सके, निर्माण कर सके, तकनीक को लगातार उन्नत कर सके और संकट के समय उसकी आपूर्ति श्रृंखला स्वतंत्र रूप से संचालित कर सके।इस दृष्टि से भारतीय नौसेना की यात्रा केवल जहाजों और पनडुब्बियों की संख्या बढ़ाने की यात्रा नहीं होनी चाहिए। यह ज्ञान, तकनीक, अनुसंधान, उद्योग और सैन्य कौशल को एक साथ विकसित करने की यात्रा होनी चाहिए। विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, सार्वजनिक क्षेत्र और निजी उद्योग के बीच मजबूत तालमेल भारत की समुद्री शक्ति को नई ऊंचाई दे सकता है।भारत के लिए समुद्र भविष्य की आर्थिक और सामरिक शक्ति का बड़ा आधार है। इसलिए आने वाले वर्षों में समुद्री बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों, तटीय सुरक्षा, समुद्री अनुसंधान और स्वदेशी रक्षा उद्योग को समान प्राथमिकता देना आवश्यक होगा।आज की वास्तविकता यह है कि भारत समुद्री क्षेत्र में अपनी पहचान बदल रहा है। वह केवल एक विशाल तटीय देश नहीं, बल्कि अपनी समुद्री सुरक्षा और हितों को लेकर अधिक सजग, आत्मविश्वासी और सक्षम राष्ट्र बन रहा है।भारत की नौसेना के बढ़ते कदम वास्तव में भारत के बढ़ते आत्मविश्वास के कदम हैं। यह यात्रा किसी शक्ति प्रदर्शन की होड़ नहीं, बल्कि उस भारत के निर्माण की यात्रा है जो अपनी प्रभुसत्ता, अखंडता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा स्वयं करने की क्षमता रखता हो।

समुद्र की लहरें सीमाएं नहीं पूछतीं; वे शक्ति, तैयारी और दूरदृष्टि की परीक्षा लेती हैं। भारत ने इस परीक्षा के लिए तैयारी शुरू कर दी है। अब आवश्यकता इस बात की है कि आत्मनिर्भरता का यह अभियान निरंतर गति पकड़े, ताकि आने वाले समय में भारतीय नौसेना केवल हिंद महासागर की महत्वपूर्ण शक्ति ही नहीं, बल्कि विश्व की प्रमुख समुद्री शक्तियों में एक सशक्त, विश्वसनीय और जिम्मेदार स्तंभ के रूप में अपनी पहचान और मजबूत करे।

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