भारत का लोकतंत्र केवल चुनाव, राजनीतिक दलों और सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं है। लोकतंत्र उस विश्वास का नाम है, जो देश की जनता अपने प्रतिनिधियों पर करती है। लेकिन आज राजनीतिक विमर्श जिस दिशा में बढ़ रहा है, वह गंभीर चिंता का विषय है। विचारधारा और नीतियों की स्वस्थ बहस के स्थान पर व्यक्तिगत कटाक्ष, फिसलती जुबान, अनर्थकारी बयान और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रतिस्पर्धा बढ़ती दिखाई दे रही है। सवाल यह है कि क्या राजनीति का उद्देश्य राष्ट्र निर्माण है या केवल सत्ता प्राप्ति?

संपादकीय चिंतन मंथन और विश्लेषण संपादक राम प्रकाश वत्स
राजनीतिक नेता के मुख से निकला प्रत्येक शब्द सामान्य नागरिक के शब्द जैसा नहीं होता। उसके पीछे उसकी राजनीतिक हैसियत, जनप्रतिनिधित्व और समाज पर प्रभाव होता है। एक गैर-जिम्मेदार बयान कभी-कभी उस आग को जन्म दे सकता है, जिसे बुझाना वर्षों तक संभव नहीं होता। इसलिए नेताओं की भाषा केवल भाषण नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है।जब कोई व्यक्ति चुनाव जीतकर संसद या विधानसभा पहुंचता है तो वह केवल अपने राजनीतिक दल का प्रतिनिधि नहीं रह जाता। वह संविधान, लोकतंत्र और जनता के विश्वास का प्रतिनिधि बन जाता है। जिस प्रकार सैनिक वर्दी पहनकर राष्ट्र की सुरक्षा की शपथ लेता है, उसी प्रकार जनप्रतिनिधि संविधान और जनता के प्रति निष्ठा की जिम्मेदारी स्वीकार करता है। दोनों की भूमिकाएं समान नहीं हैं, लेकिन राष्ट्र के प्रति कर्तव्य और जवाबदेही की भावना दोनों में सर्वोपरि होनी चाहिए।इसीलिए राजनीतिक दलों का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उन्होंने कितनी सीटें जीतीं या सत्ता में कितने वर्ष रहे। असली कसौटी यह होनी चाहिए कि उनके नेता लोकतांत्रिक मर्यादा, सार्वजनिक जीवन की शुचिता, संविधान और राष्ट्रहित के प्रति कितने प्रतिबद्ध हैं।
राजनीति में आपराधिक मामलों से जुड़े नेताओं की मौजूदगी भी लोकतंत्र के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा करती है। हालांकि किसी व्यक्ति पर आरोप लगना और दोष सिद्ध होना अलग-अलग बातें हैं तथा कानून की दृष्टि से हर व्यक्ति तब तक निर्दोष है जब तक न्यायालय उसे दोषी न ठहराए। लेकिन गंभीर आपराधिक मामलों वाले लोगों का राजनीतिक प्रभाव बढ़ना निश्चित रूप से राजनीतिक दलों और मतदाताओं दोनों के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए।जनप्रतिनिधि बनने के बाद सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और जवाबदेही और अधिक बढ़नी चाहिए। राजनीति यदि वास्तव में समाजसेवा है तो उसमें व्यक्तिगत वैभव, निजी स्वार्थ और सत्ता का अहंकार नहीं, बल्कि जनहित सर्वोच्च होना चाहिए।
आज आवश्यकता किसी एक राजनीतिक दल को कठघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक वर्ग से एक मूल प्रश्न पूछने की है—देश पहले या दल? राष्ट्रहित पहले या निजी राजनीतिक हित? संविधान पहले या सत्ता?
राजनीतिक दल लोकतंत्र के आवश्यक स्तंभ हैं, लेकिन राष्ट्र उनसे बड़ा है। पार्टी की विचारधारा महत्वपूर्ण हो सकती है, पर भारत की एकता, अखंडता, संविधान और सामाजिक शांति उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।नेताओं को यह समझना होगा कि उनकी जुबान से निकला शब्द केवल भाषण का हिस्सा नहीं होता। वह समाज की मानसिकता को प्रभावित कर सकता है, समर्थकों को दिशा दे सकता है और कभी-कभी तनाव को जन्म दे सकता है। इसलिए राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ राजनीतिक संयम भी अनिवार्य है।लोकतंत्र में कठोर आलोचना का अधिकार होना चाहिए, लेकिन आलोचना और अपमान के बीच की रेखा मिटनी नहीं चाहिए। राजनीतिक विरोध लोकतंत्र की शक्ति है, जबकि राजनीतिक वैमनस्य लोकतंत्र की कमजोरी।देश को ऐसे नेताओं की आवश्यकता है जो चुनाव जीतने के बाद केवल अपनी पार्टी के नेता न रहें, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के प्रतिनिधि बनें। जिस प्रकार सैनिक की निष्ठा राष्ट्र के प्रति होती है, उसी भावना से जनप्रतिनिधि को भी अपने पद को व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि सार्वजनिक दायित्व समझना चाहिए।और यदि कोई जनप्रतिनिधि कानून तोड़ता है तो उसके लिए वही संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया लागू होनी चाहिए जो सामान्य नागरिक पर लागू होती है। लोकतंत्र में पद कानून से ऊपर नहीं हो सकता।भारत की राजनीति का भविष्य केवल नेताओं के हाथ में नहीं है। जनता भी उसकी दिशा तय करती है। मतदाता को जाति, धर्म, क्षेत्र, भावनात्मक नारों और राजनीतिक प्रचार से ऊपर उठकर उम्मीदवार के चरित्र, कार्य, नीतियों और सार्वजनिक आचरण को कसौटी बनाना होगा।
अंततः लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंत्र यही होना चाहिए—
देश पहले, संविधान पहले, जनता पहले; राजनीतिक दल और व्यक्तिगत हित उसके बाद।
यदि राजनीति इस मूल भावना को अपना लेती है तो लोकतंत्र केवल चुनावी व्यवस्था नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्र निर्माण की सबसे शक्तिशाली व्यवस्था बन जाएगा। लेकिन यदि सत्ता और दलगत हित राष्ट्रहित पर हावी होते रहे, तो आने वाली पीढ़ियां हमसे यह सवाल जरूर पूछेंगी कि जब लो

