महमूदाबाद, सीतापुर/SCB/ ANUJ KUMAR JAIN
नगर स्थित श्री 1008 शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में श्री 108 विराग सागर जी मुनिराज की शिष्या आर्यिका श्री 105 विविक्त श्री माताजी ससंघ का मंगल चतुर्मास विधि-विधान एवं श्रद्धाभाव के साथ संपन्न हुआ। चतुर्मास स्थापना एवं कलश प्रतिष्ठा का आयोजन प्रतिष्ठाचार्य भैया आशीष पुण्यान्स तथा संगीतकार लवकेश जैन (भोपाल) के सानिध्य में सम्पन्न हुआ।
इस पावन अवसर पर बड़ी संख्या में जैन श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर धर्मलाभ प्राप्त किया। कार्यक्रम में दरियाबाद, फतेहपुर, पेतेपुर, बेलहरा, बाराबंकी, रामपुर मथुरा, बिसवां, भिंड (मध्य प्रदेश), बड़ागांव सहित विभिन्न नगरों से आए श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर पुण्य अर्जित किया।
मंदिर परिसर में पूरे आयोजन के दौरान भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने आर्यिका संघ का आशीर्वाद प्राप्त कर धर्म, संयम एवं सदाचार के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। आयोजन के सफल संचालन में जैन समाज के पदाधिकारियों एवं श्रद्धालुओं का विशेष सहयोग रहा।
जैन धर्म में चतुर्मास का महत्व: आत्मशुद्धि, तप और धर्म साधना का पावन काल
जैन धर्म में चतुर्मास वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक काल माना जाता है। “चतुर्मास” का अर्थ है चार महीने। यह अवधि सामान्यतः आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक रहती है। वर्षा ऋतु के इन चार महीनों में जैन साधु-साध्वी एक ही स्थान पर निवास करते हैं और व्यापक रूप से धर्मोपदेश, स्वाध्याय तथा साधना का कार्य करते हैं।
चतुर्मास क्यों मनाया जाता है?
जैन धर्म का मूल सिद्धांत अहिंसा परमोधर्मः है। वर्षा ऋतु में पृथ्वी पर असंख्य सूक्ष्म जीव-जंतु उत्पन्न हो जाते हैं। यदि साधु-साध्वी लगातार विहार (यात्रा) करें तो अनजाने में इन जीवों की हिंसा होने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए वे वर्षा ऋतु में एक स्थान पर रुककर साधना करते हैं। यही परंपरा चतुर्मास कहलाती है।
चतुर्मास का आध्यात्मिक महत्व
चतुर्मास केवल साधु-साध्वियों के लिए ही नहीं, बल्कि गृहस्थों के लिए भी आत्मकल्याण का विशेष अवसर है। इस दौरान श्रद्धालु—
1 नियमित मंदिर दर्शन और पूजा करते हैं। 2 प्रवचन एवं धर्मसभा में भाग लेते हैं। 3 स्वाध्याय और आगमों का अध्ययन करते हैं। 4 उपवास, एकासन, आयम्बिल, नवकारसी जैसे तप करते हैं। 5 दान, सेवा और जीवदया के कार्यों में भाग लेते हैं। 6 क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों को त्यागने का प्रयास करते हैं।
साधु-साध्वियों की भूमिका
चतुर्मास के दौरान जैन मुनि और आर्यिकाएं एक स्थान पर रहकर—
1 धर्म प्रवचन देते हैं। 2जैन आगमों की व्याख्या करते हैं। 3युवाओं और बच्चों को धार्मिक संस्कार प्रदान करते हैं 4समाज को अहिंसा, सत्य, संयम और सदाचार का संदेश देते हैं। 5आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की प्रेरणा देते हैं।
समाज के लिए चतुर्मास का महत्व
1 चतुर्मास समाज को आध्यात्मिक रूप से जोड़ने का भी माध्यम है। इस अवधि में अनेक धार्मिक आयोजन होते हैं, जिनमें 2 चतुर्मास स्थापनाकलश प्रतिष्ठाअभिषेक एवं शांतिधारा 3 प्रवचनमालाभक्ति संध्यासामूहिक स्वाध्यायतप एवं उपवास कार्यक्रमपर्युषण पर्वदशलक्षण महापर्वजैसे महत्वपूर्ण आयोजन शामिल होते हैं।
पर्युषण और दशलक्षण का विशेष महत्व
चतुर्मास के भीतर आने वाले पर्युषण पर्व (श्वेतांबर परंपरा) तथा दशलक्षण महापर्व (दिगंबर परंपरा) जैन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण पर्व हैं। इन दिनों श्रद्धालु उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य जैसे दस धर्मों का पालन करने का संकल्प लेते हैं। अंतिम दिन क्षमावाणी के माध्यम से सभी से क्षमा मांगने और क्षमा करने की परंपरा निभाई जाती है।
नैतिक और सामाजिक संदेश
चतुर्मास हमें सिखाता है कि जीवन में केवल भौतिक सुख ही नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति भी आवश्यक है। यह काल—आत्मचिंतन का अवसर देता है 2संयमित जीवन जीने की प्रेरणा देता है 3जीवों के प्रति करुणा और अहिंसा का भाव विकसित करता है। 4परिवार और समाज में सद्भाव तथा नैतिक मूल्यों को मजबूत करता है।
जैन धर्म में चतुर्मास केवल चार महीनों का धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, तप, संयम, अहिंसा और आध्यात्मिक जागरण का महापर्व है। यह वह समय है जब साधु-साध्वियों के सान्निध्य में समाज धर्म की गहराइयों को समझता है, अपने जीवन को सदाचार की दिशा में अग्रसर करता है और मोक्षमार्ग की ओर बढ़ने का संकल्प लेता है। इसलिए चतुर्मास को जैन परंपरा में अत्यंत पवित्र, प्रेरणादायी और कल्याणकारी काल माना गया है।

