सबसे बड़ा सवाल यही है कि बीडीसी बोर्ड पर किसका कब्जा होगा
EDITOR RAM PARKADH VATS
ज्वाली विकास खंड की 26 बीडीसी सीटों के परिणाम सामने आने के बाद स्थानीय राजनीति में नई हलचल तेज हो गई है। चुनावी नतीजों ने एक ओर भाजपा समर्थित खेमे को बढ़त दी है, तो दूसरी ओर कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवारों की मौजूदगी ने राजनीतिक समीकरणों को रोचक बना दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि बीडीसी बोर्ड पर किसका कब्जा होगा।
आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा समर्थित 14 उम्मीदवार जीतकर आए हैं, जबकि कांग्रेस समर्थित 08 प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की है। इसके अलावा 04 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहे हैं। 26 सदस्यीय सदन में चेयरमैन और वाइस चेयरमैन चुनने के लिए 14 सदस्यों का समर्थन निर्णायक माना जाता है। इस लिहाज से भाजपा समर्थित खेमे ने बहुमत के आंकड़े को छू लिया है और कागजी तौर पर उसकी स्थिति मजबूत दिखाई देती है।
लेकिन ज्वाली की राजनीति हमेशा सीधी रेखा में चलने वाली नहीं रही। स्थानीय स्तर पर व्यक्तिगत संबंध, पंचायत आधारित समीकरण और क्षेत्रीय संतुलन कई बार चुनाव बाद की राजनीति को बदल देते हैं। ऐसे में यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि केवल संख्या बल के आधार पर बोर्ड गठन तय हो चुका है।
यहां निर्दलीय सदस्यों की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है। यदि किसी कारणवश भाजपा के भीतर असंतोष या क्रॉस वोटिंग जैसी स्थिति बनती है, तो कांग्रेस निर्दलीयों के समर्थन से राजनीतिक समीकरण बदलने का प्रयास कर सकती है। हालांकि मौजूदा स्थिति में कांग्रेस के लिए यह चुनौती आसान नहीं दिखती, क्योंकि उसे बहुमत तक पहुंचने के लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाने के साथ-साथ भाजपा खेमे में सेंध लगाने की भी जरूरत होगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में बैठकों, रणनीतिक चर्चाओं और संपर्क अभियानों का दौर तेज हो सकता है। चेयरमैन और वाइस चेयरमैन के चुनाव तक दोनों पक्ष अपने-अपने समर्थन को एकजुट रखने की पूरी कोशिश करेंगे।
फिलहाल आंकड़े भाजपा के पक्ष में झुकते नजर आ रहे हैं, लेकिन ज्वाली की राजनीति में अंतिम क्षण तक बदलाव की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। अब सबकी निगाहें बीडीसी बोर्ड गठन पर टिकी हैं—क्या भाजपा अपना बहुमत सुरक्षित रख पाएगी या कांग्रेस कोई सियासी उलटफेर कर नई कहानी लिखेगी?

