Reading: सत्ता का शिखर जब अहंकार में बदल जाए, तब कुर्सी मोह बन जाती है।अर्श से फर्श तक का सफर राजनीति में एक पल में तय हो जाता है।”

सत्ता का शिखर जब अहंकार में बदल जाए, तब कुर्सी मोह बन जाती है।अर्श से फर्श तक का सफर राजनीति में एक पल में तय हो जाता है।”

RamParkash Vats
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1 जनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे बयान अधिकतर राजनीतिक दबाव और जनसमर्थन बनाए रखने की रणनीति होते हैं। लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता और संविधान का होता है, न कि कुर्सी के मोह का।

2 लेकिन कानूनी दृष्टि से सवाल यह है कि क्या कोई राज्य का मुख्यमंत्री चुनाव हारने के बाद सीधे इंटरनेशनल कोर्ट जा सकता है?भारत के संविधान और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार इसका सीधा उत्तर है — नहीं।

HEAD OFFICE NATIONAL NEWS DESK FDITOR RAM PARKASH VATS

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के परिणामों के बाद राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। चुनावी हार के बाद मुख्यमंत्री Mamata Banerjee द्वारा पद न छोड़ने तथा मामले को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय यानी International Court of Justice (ICJ) तक ले जाने जैसी चर्चाओं ने राजनीतिक बहस को और गर्म कर दिया है। राजनीति में जब कोई नेता लंबे समय तक सत्ता के शीर्ष पद पर रहता है तो धीरे-धीरे कुर्सी के प्रति लगाव और अधिकार की भावना बढ़ने लगती है। कई बार यही भावना अहंकार का रूप ले लेती है, जहां व्यक्ति स्वयं को जनता से ऊपर समझने लगता है। सत्ता का मोह ऐसा जाल है जो बड़े-बड़े नेताओं को भी वास्तविकता से दूर कर देता है। यही कारण है कि राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि “अर्श से फर्श पर आने में समय नहीं लगता।”

लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है। चुनाव परिणाम यह तय करते हैं कि जनता किसे शासन की जिम्मेदारी देना चाहती है। यदि कोई मुख्यमंत्री चुनाव हार जाता है या उसकी पार्टी बहुमत खो देती है, तो संवैधानिक परंपरा के अनुसार उसे पद छोड़ना पड़ता है। भारत का संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि राज्य सरकार विधानसभा के बहुमत पर आधारित होती है। बहुमत समाप्त होने पर सरकार नैतिक और संवैधानिक दोनों आधारों पर कमजोर हो जाती है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई राज्य का मुख्यमंत्री सीधे अंतरराष्ट्रीय अदालत जा सकता है? कानूनी दृष्टि से इसका उत्तर “नहीं” माना जाता है। International Court of Justice केवल देशों के बीच होने वाले विवादों की सुनवाई करता है, किसी राज्य सरकार, मुख्यमंत्री या राजनीतिक दल की नहीं। भारत एक संप्रभु राष्ट्र है और उसके अंदर होने वाले चुनावी विवादों का समाधान भारतीय न्यायपालिका के अंतर्गत ही होता है। चुनाव से जुड़े मामलों की सुनवाई पहले चुनाव आयोग, फिर हाईकोर्ट और अंत में Supreme Court of India तक की जा सकती है।

इसलिए किसी मुख्यमंत्री द्वारा सीधे ICJ जाने की बात अधिकतर राजनीतिक बयानबाजी मानी जाती है, न कि व्यावहारिक कानूनी विकल्प। लोकतंत्र में सत्ता स्थायी नहीं होती। जनता जिस नेता को शिखर पर पहुंचाती है, वही जनता समय आने पर उसे सत्ता से बाहर भी कर सकती है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।

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