Reading: पश्चिम बंगाल में चुनावी रणनीति ने ममता बनर्जी व शुभेंदु के राजनीतिक दांव पेंचों की जोर आजमाइश रही प्रमुखर। हार जीत भाजपा या एआइसीटी का भविष्य तय करेगी।

पश्चिम बंगाल में चुनावी रणनीति ने ममता बनर्जी व शुभेंदु के राजनीतिक दांव पेंचों की जोर आजमाइश रही प्रमुखर। हार जीत भाजपा या एआइसीटी का भविष्य तय करेगी।

RamParkash Vats
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न्यूज़ इंडिया आजतक, संपादक राम प्रकाश वत्स

पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। सत्तारूढ़ नेता ममता बनर्जी के 15 वर्षों के शासन का जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी ने सूक्ष्म विश्लेषण किया और उसे चुनावी रणनीति का आधार बनाया, वह इस चुनाव को साधारण मुकाबले से कहीं आगे ले जाता है। भाजपा ने केवल विरोध नहीं किया, बल्कि शासन की कमियों को ‘दुखती रग’ की तरह पहचान कर उन्हें जन-भावनाओं से जोड़ने का प्रयास किया—और यहीं से चुनावी विमर्श की दिशा तय होती दिखी।
ममता बनर्जी अपनी बेबाक शैली, आक्रामक तेवर और अडिग राजनीतिक व्यक्तित्व के लिए जानी जाती हैं। यही शैली उन्हें जननेता के रूप में स्थापित भी करती है और कई बार उनके खिलाफ माहौल भी तैयार करती है। इस बार का चुनाव उनके लिए सिर्फ सत्ता बचाने का प्रश्न नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वसनीयता की पुनर्पुष्टि का भी अवसर है। दूसरी ओर भाजपा ने इस चुनाव को ‘परिवर्तन’ के आख्यान में ढालने की कोशिश की है, जिससे मुकाबला और अधिक तीखा हो गया है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे चौंकाने वाला तथ्य रहा अभूतपूर्व मतदान—दो चरणों में कुल 92.47%। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी का असाधारण संकेत है। पश्चिम बंगाल में परंपरागत रूप से उच्च मतदान होता रहा है, लेकिन 90% से ऊपर का स्तर शहरी और ग्रामीण—दोनों क्षेत्रों में—पहले कभी नहीं देखा गया। इससे पहले 2011 के विधानसभा चुनाव में 84.72% मतदान दर्ज हुआ था, जो अब इतिहास बन चुका है।
उच्च मतदान के पीछे कई कारण गिनाए जा रहे हैं। एक प्रमुख कारण मतदाता सूचियों का ‘विशेष गहन संशोधन’ (SIR) बताया जा रहा है, जिसके चलते कथित रूप से 90 लाख से अधिक नाम हटाए गए। इससे मतदाता सूची का आकार छोटा हुआ और प्रतिशत बढ़ा—यह एक तर्क है। लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण दूसरा पहलू है—मतदाताओं में उत्पन्न आशंका। कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि सूची से नाम हटने के डर ने लोगों को मतदान के लिए अधिक प्रेरित किया। नागरिक अधिकारों के संभावित हनन की चिंता ने लोकतांत्रिक भागीदारी को एक नई ऊर्जा दी।
इसका प्रभाव सामाजिक स्तर पर भी दिखा—प्रवासी मजदूर बड़ी संख्या में अपने गांव लौटे, केवल इस आशंका से कि यदि वे इस बार मतदान से चूक गए तो भविष्य में उनका नाम सूची से बाहर हो सकता है। यह स्थिति लोकतंत्र के उस मनोवैज्ञानिक पक्ष को उजागर करती है, जहां अधिकार की रक्षा का भाव स्वयं भागीदारी को बढ़ा देता है।
अब प्रश्न यह है कि यह रिकॉर्ड मतदान किसके पक्ष में जाएगा। यदि परिणाम भाजपा के अनुरूप आते हैं, तो यह पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐतिहासिक उलटफेर साबित होगा। वहीं, यदि ममता बनर्जी इस चुनौती को पार कर जाती हैं, तो यह उनके नेतृत्व की सबसे बड़ी राजनीतिक जीत मानी जाएगी।

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