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पंचायत चुनावों में बदला माहौल, मतदाता खामोश, प्रत्याशियों की बढ़ी बेचैनी, गांव-गांव में चुनावी सरगर्मियां तेज, विकास और विश्वास के मुद्दों पर जनता करेगी इस बार बड़ा फैसला

RamParkash Vats
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प्रत्याशियों की परेशानी का एक बड़ा कारण गांवों की बदलती राजनीतिक सोच भी है। पहले जाति, रिश्तेदारी और दबाव के आधार पर वोट पड़ जाते थे,
EDITOR RAM PARKASH VATS

गांव की चौपालों से लेकर चाय की दुकानों तक इन दिनों पंचायत चुनावों की चर्चाएं जोरों पर हैं। हर गली, हर मोड़ और हर घर के बाहर चुनावी हलचल दिखाई दे रही है, लेकिन इस बार का माहौल कुछ अलग और अजीबोगरीब नजर आ रहा है। पहले जहां चुनाव आते ही मतदाता खुलकर अपनी पसंद जाहिर कर देते थे, वहीं अब मतदाता पूरी तरह खामोश दिखाई दे रहे हैं। दूसरी ओर प्रत्याशियों की रातों की नींद उड़ी हुई है। कौन किसके साथ है, कौन कब पलटी मार दे, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया है।पंचायत चुनाव गांव की लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। यह केवल प्रधान, उपप्रधान या वार्ड सदस्य चुनने का चुनाव नहीं होता, बल्कि गांव के भविष्य की दिशा तय करने का अवसर भी होता है। लेकिन इस बार मतदाता बेहद सतर्क दिखाई दे रहे हैं। वे प्रत्याशियों को ध्यान से सुन रहे हैं, उनकी गतिविधियों पर नजर रख रहे हैं, परंतु अपनी राय किसी के सामने प्रकट नहीं कर रहे। यही कारण है कि प्रत्याशी असमंजस की स्थिति में हैं।

गांवों में एक अजीब स्थिति देखने को मिल रही है। प्रत्याशी घर-घर जाकर समर्थन मांग रहे हैं। हाथ जोड़ रहे हैं, विकास के बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं, लेकिन मतदाता केवल मुस्कुराकर “देखेंगे” या “सोचेंगे” कहकर बात समाप्त कर देते हैं। यह चुप्पी प्रत्याशियों के लिए सबसे बड़ी चिंता बन गई है। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि आखिर जनता किस ओर झुक रही है।इस बार चुनावों में सोशल मीडिया का भी बड़ा प्रभाव देखने को मिल रहा है। व्हाट्सएप ग्रुपों में प्रचार चल रहा है, फेसबुक पोस्टों के माध्यम से एक-दूसरे पर कटाक्ष किए जा रहे हैं और छोटे-छोटे वीडियो बनाकर जनता को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन गांव का मतदाता अब पहले जैसा भोला नहीं रहा। वह हर बात को समझ रहा है और सोच-समझकर फैसला लेने के मूड में दिखाई दे रहा है।

प्रत्याशियों की परेशानी का एक बड़ा कारण गांवों की बदलती राजनीतिक सोच भी है। पहले जाति, रिश्तेदारी और दबाव के आधार पर वोट पड़ जाते थे, लेकिन अब युवा मतदाता विकास, ईमानदारी और व्यवहार को महत्व देने लगे हैं। गांव की टूटी सड़कें, पानी की समस्या, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और पंचायत के अधूरे कार्य अब चुनावी मुद्दे बन चुके हैं। जनता सवाल पूछ रही है और प्रत्याशियों से जवाब मांग रही है।कई गांवों में तो स्थिति इतनी रोचक हो गई है कि प्रत्याशी अपने समर्थकों के जरिए लगातार फीडबैक लेने में जुटे हैं। कोई कहता है कि माहौल उसके पक्ष में है, तो कोई दावा करता है कि जनता बदलाव चाहती है। लेकिन असली तस्वीर किसी को स्पष्ट नहीं है। यही कारण है कि प्रत्याशियों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं।

मतदाताओं की खामोशी के पीछे एक और कारण यह भी है कि लोग अब चुनावी वादों से जल्दी प्रभावित नहीं होते। वर्षों से सुनते आ रहे वादों और अधूरे विकास कार्यों ने जनता को सावधान बना दिया है। लोग अब केवल भाषण नहीं, बल्कि काम का हिसाब मांग रहे हैं। यही वजह है कि इस बार प्रत्याशी हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं।गांवों में देर रात तक बैठकों का दौर चल रहा है। कहीं रणनीति बनाई जा रही है तो कहीं समीकरण बैठाए जा रहे हैं। रिश्तेदारियों और सामाजिक संबंधों का पूरा गणित लगाया जा रहा है। लेकिन अंत में सबकी नजर उस खामोश मतदाता पर जाकर टिक जाती है, जो इस बार किसी के सामने अपने पत्ते खोलने को तैयार नहीं।

दरअसल, लोकतंत्र की यही खूबसूरती भी है। मतदाता जब जागरूक हो जाता है तो बड़े-बड़े राजनीतिक समीकरण बदल जाते हैं। पंचायत चुनाव भले ही गांव स्तर के चुनाव हों, लेकिन इनका महत्व बहुत बड़ा होता है। यही चुनाव गांव की तस्वीर बदल सकते हैं और सही नेतृत्व का चयन कर सकते हैं।फिलहाल गांवों में चुनावी माहौल पूरी तरह गर्म है। प्रत्याशी दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, समर्थक अपने-अपने दावे कर रहे हैं, लेकिन मतदाता की चुप्पी ने सबको असमंजस में डाल रखा है। अब देखना यह होगा कि मतदान वाले दिन यह खामोश मतदाता किसके पक्ष में अपना फैसला सुनाता है। क्योंकि पंचायत चुनावों में आखिरकार जीत उसी की होती है, जो जनता का विश्वास जीतने में सफल रहता है।

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