Reading: कांगड़ा जिले के जसूर (NURPUR)गांव में जन्मे सोमदत्त बट्टू एक ऐसे सुर साधक, जिनकी आवाज़ में पहाड़ों की आत्मा और लोकजीवन की मिठास बसती है।

कांगड़ा जिले के जसूर (NURPUR)गांव में जन्मे सोमदत्त बट्टू एक ऐसे सुर साधक, जिनकी आवाज़ में पहाड़ों की आत्मा और लोकजीवन की मिठास बसती है।

RamParkash Vats
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Head Office News India Aaj Tak /Bharmar/ 10 April 2026/Editir Ram Prkash Vats

हिमाचल प्रदेश की संस्कृति, प्रदेश की विविध भाषाओं और समृद्ध परंपराओं को एक गुलदस्ते में समेटकर उन्होंने सांस्कृतिक विरासत को जीवंत करने का सराहनीय प्रयास किया। उनकी साधना ने पहाड़ की लोक आत्मा को स्वर देकर उसे नई पहचान दिलाई।विभिन्न क्षेत्रों की लोकधुनों को जोड़कर लोकगीत संस्कृति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सशक्त सांस्कृतिक धरोहर तैयार की।

11 अप्रैल सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि हिमाचल की लोकधुनों को नई पहचान देने वाले महान संगीत साधक सोमदत्त बट्टू की जन्मतिथि है। कांगड़ा जिले के जसूर गांव में जन्मे बट्टू ने अपने स्वर और साधना से हिमाचली लोकसंगीत को देश-विदेश तक पहुंचाया। लोक और शास्त्रीय संगीत के अद्भुत संगम के कारण उन्हें “हिमाचल गौरव” के रूप में भी सम्मानित किया जाता है। 🎶

11 अप्रैल 1938 को जन्मे सोमदत्त बट्टू का बचपन संगीत से सराबोर वातावरण में बीता। उनके पिता स्वयं गायक थे, इसलिए घर में हमेशा सुरों की गूंज रहती थी। गांव की चौपालों, मेलों और धार्मिक आयोजनों में गूंजती लोकधुनों ने उनके भीतर संगीत की मजबूत नींव तैयार की। यही कारण रहा कि कम उम्र में ही उन्होंने लोकसंगीत की बारीकियों को समझना शुरू कर दिया।

बाद में उन्होंने शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा प्राप्त की। ग्वालियर घराने के श्रीकुंज लाल शर्मा और पटियाला घराने के कुंदनलाल शर्मा से प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने इंदौर घराने के महान उस्ताद उस्ताद अमीर खान के सानिध्य में अपनी गायकी को निखारा। इन तीनों परंपराओं का संगम उनकी संगीत शैली की सबसे बड़ी पहचान बना, जिसमें रागों की गंभीरता और लोकधुनों की सरलता का अद्भुत मेल दिखाई देता है।

सोमदत्त बट्टू की खासियत यह रही कि उन्होंने लोकसंगीत और शास्त्रीय संगीत को कभी अलग-अलग नहीं माना। उनकी प्रस्तुतियों में हिमाचली लोकधुनों का अपनापन और शास्त्रीय रागों की गहराई साथ-साथ सुनाई देती थी। उन्होंने प्रदेश की अनेक लोक शैलियों को संजोने, संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे आकाशवाणी और दूरदर्शन के शीर्ष श्रेणी के कलाकार रहे और उनके कार्यक्रमों को देशभर में सराहा गया।

सिर्फ गायक ही नहीं, सोमदत्त बट्टू एक लेखक और शोधकर्ता भी रहे। उन्होंने हिमाचली लोकसंगीत पर गहन अध्ययन किया और उसे दस्तावेज़ी रूप में सुरक्षित किया। देश-विदेश के प्रतिष्ठित संगीत समारोहों में उन्होंने हिमाचल का प्रतिनिधित्व करते हुए भारतीय लोकसंगीत की पहचान को मजबूत किया।

उनकी दीर्घ संगीत साधना को अनेक सम्मानों से नवाजा गया। उन्हें 2018 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1975 में संगीत कला रत्न, 2001 में डॉ. यशवंत सिंह परमार पुरस्कार, 2012 में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड औ2014 में संगीत मार्तंड पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके जीवन का सबसे बड़ा सम्मान 2024 में मिला, जब उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया गया।हिमाचल की लोकधुनों को वैश्विक पहचान दिलाने वाले सोमदत्त बट्टू आज भी संगीत प्रेमियों के लिए प्रेरणा हैं—एक ऐसे सुर साधक, जिनकी आवाज़ में पहाड़ों की आत्मा और लोकजीवन की मिठास बसती है।

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