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धारावाहिक (61) भारत के स्वतंत्र सैनानी:वह थाली बजाते हुए घोषणा करता—वासुदेव बलवंत फड़के ने थाली बजाकर जगाई आज़ादी की चेतना, पहली क्रांतिकारी सेना बनाई, अंग्रेज़ शासन को खुली चुनौती दी

RamParkash Vats
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“देश को आज़ाद होना चाहिए, अंग्रेज़ों को भगाना होगा।” यह युवक कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि भारत के प्रारंभिक क्रांतिकारी नेताओं में गिने जाने वाले वासुदेव बलवंत फड़के थे

धारावाहिक (61) भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि-कोटि नमन लेखक संपादक राम प्रकाश वत्स

1870 के दशक के मध्य में पुणे की गलियों में एक अनोखा दृश्य देखने को मिलता था। करीब 30 वर्ष की आयु का एक तेजस्वी युवक हाथ में थाली और चम्मच लेकर दौड़ता हुआ लोगों को शाम के समय शनिवार-वाड़ा मैदान में इकट्ठा होने का आह्वान करता था। वह थाली बजाते हुए घोषणा करता— “देश को आज़ाद होना चाहिए, अंग्रेज़ों को भगाना होगा।” यह युवक कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि भारत के प्रारंभिक क्रांतिकारी नेताओं में गिने जाने वाले वासुदेव बलवंत फड़के थे, जिन्होंने स्वतंत्रता की चेतना को जन-जन तक पहुंचाने का साहसिक प्रयास किया।

4 नवम्बर 1845 को ठाणे जिले के शिर्डों में जन्मे फड़के का परिवार कोंकण क्षेत्र के केल्शी गांव से संबंधित था। पढ़ाई में तेज फड़के बंबई विश्वविद्यालय के शुरुआती स्नातकों में शामिल रहे और बाद में सैन्य वित्त विभाग में नौकरी करने लगे। शांत पारिवारिक जीवन और सरकारी नौकरी के बावजूद उनके भीतर देशभक्ति की आग जल रही थी। उस समय जब राजनीतिक गतिविधियां केवल याचिकाओं और संवैधानिक दायरे तक सीमित थीं, फड़के खुले तौर पर अंग्रेज़ों को भारत से निकालने की बात कर रहे थे।

पुणे में उनके भाषणों का असर धीरे-धीरे दिखाई देने लगा। उन्होंने पनवेल, पलास्पे, तासगांव और नरसोबाची वाड़ी जैसे क्षेत्रों में जाकर लोगों को जागृत करने का अभियान चलाया। जब अपेक्षित जनसमर्थन नहीं मिला तो उन्होंने गुप्त संगठन बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए। उन्होंने युवाओं को शारीरिक प्रशिक्षण देना शुरू किया और देशभक्ति के संदेश फैलाने के लिए अलग-अलग समूह बनाए। सुबह देशभक्ति गीत, शाम को ब्रिटिश शासन पर कटाक्ष और गुप्त बैठकों के माध्यम से उन्होंने क्रांतिकारी वातावरण तैयार किया।

1876-77 के भीषण अकाल ने फड़के के विचारों को और उग्र बना दिया। उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर जनता की दुर्दशा देखी और ब्रिटिश नीतियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। इसके बाद उन्होंने सशस्त्र संघर्ष का मार्ग चुना। 20 फरवरी 1879 को अपने साथियों के साथ उन्होंने लगभग 200 योद्धाओं की एक क्रांतिकारी सेना गठित की। इसे भारत के शुरुआती सशस्त्र विद्रोही प्रयासों में गिना जाता है। उन्होंने घोषणा की कि हथियार और धन जुटाकर अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ संघर्ष तेज किया जाएगा।

फड़के और उनके साथियों ने धन और हथियार जुटाने के लिए कई साहसिक कार्रवाइयां कीं, जिससे अंग्रेज़ प्रशासन में हड़कंप मच गया। उनकी गतिविधियों से पूरे क्षेत्र में भय और उत्साह दोनों फैल गया। उन्होंने सरकार की आर्थिक नीतियों की तीखी आलोचना करते हुए घोषणापत्र जारी किया, जिसकी प्रतियां अधिकारियों को भेजी गईं। यह विद्रोह इतना प्रभावशाली था कि अंग्रेज़ी अखबारों तक में इसकी चर्चा हुई और शासन को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार की सलाह दी गई।

लगातार संघर्ष के बाद 20 जुलाई 1879 को फड़के को गिरफ्तार कर लिया गया। पुणे की अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई। जेल में तपेदिक से पीड़ित होने के बावजूद उनका मनोबल अडिग रहा। 17 फरवरी 1883 को मात्र 37 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। यद्यपि उनका क्रांतिकारी जीवन अल्पकालिक रहा, परंतु वासुदेव बलवंत फड़के ने भारत में सशस्त्र स्वतंत्रता आंदोलन की नींव रखी और आने वाली पीढ़ियों के क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा बन गए i

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