स्वतंत्र सैनानी (तिलका मांझी कोटि-कोटि नमन

भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि-कोटि नमन संपादक राम प्रकाश वत्स
तिलका मांझी भारत के पहले आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने 1857 की क्रांति से बहुत पहले अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का बिगुल फूंका। उन्हें ‘जबरा पहाड़िया’ के नाम से भी जाना जाता था। उनका जीवन आदिवासी अस्मिता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता की प्रेरक गाथा है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन : तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी 1750 को बिहार के सुल्तानगंज के तिलकपुर गाँव में एक संथाल परिवार में हुआ। बचपन से ही उन्होंने अंग्रेजों द्वारा आदिवासियों पर किए जा रहे अत्याचार, जमीनों की लूट और शोषण को देखा। यही परिस्थितियाँ उनके भीतर विद्रोह की चिंगारी बन गईं। वे साहसी, तेजस्वी और नेतृत्व क्षमता से भरपूर थे।
अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह :1770 के भीषण अकाल के दौरान अंग्रेजों ने जनता की सहायता करने के बजाय कर वसूली जारी रखी। इस अन्याय के खिलाफ तिलका मांझी ने अंग्रेजों के खजाने पर धावा बोला और लूटा गया धन गरीबों में बाँट दिया। इससे वे आदिवासियों और गरीबों के बीच जननायक बन गए। 1771 से 1785 तक उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लगातार संघर्ष जारी रखा।गुरिल्ला युद्ध की रणनीतितिलका मांझी ने पहाड़िया और संथाल समुदाय को संगठित कर गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई। वे जंगलों और पहाड़ियों से अचानक हमला करते और अंग्रेजों को भारी नुकसान पहुंचाते। उनकी इस रणनीति से अंग्रेजी सेना परेशान हो गई थी।
क्लीवलैंड का वध :13 जनवरी 1784 को तिलका मांझी ने राजमहल के ब्रिटिश अधीक्षक ऑगस्टस क्लीवलैंड पर तीर-कमान से हमला किया। इस हमले में क्लीवलैंड की मृत्यु हो गई। यह घटना अंग्रेजों के लिए बड़ा झटका थी और उन्होंने तिलका मांझी को पकड़ने के लिए व्यापक अभियान शुरू कर दिया।गिरफ्तारी और शहादतअंग्रेजों ने भागलपुर के जंगलों को घेर लिया और अंततः धोखे से तिलका मांझी को पकड़ लिया। उन्हें चार घोड़ों से बांधकर घसीटते हुए भागलपुर लाया गया। 13 जनवरी 1785 को एक बरगद के पेड़ पर उन्हें फांसी दे दी गई। इस प्रकार भारत के इस वीर योद्धा ने मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
विरासत और सम्मान : तिलका मांझी की वीरता और बलिदान को आज भी गर्व से याद किया जाता है। उनके सम्मान में तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय का नामकरण किया गया। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत और आदिवासी प्रतिरोध के प्रतीक माने जाते हैं।तिलका मांझी का संघर्ष केवल आदिवासियों के अधिकारों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह पूरे भारत की स्वतंत्रता की पहली सशस्त्र चेतना था। उनका जीवन हमें अन्याय के खिलाफ डटकर खड़े होने और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देता है।

