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धारावाहिक (58)वासुदेव बलवंत फड़के: वह क्रांतिकारी जिनकी आदिवासी सेना ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवाए

RamParkash Vats
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वासुदेव बलवंत फड़के: वह क्रांतिकारी जिनकी आदिवासी सेना ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवाए
भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि-कोटि नमन: न्यूज इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम स्वतंत्रता सेनानियों के अदम्य साहस, त्याग और बलिदान की गौरवगाथा है, जिसमें देशभक्तों ने मातृभूमि की आज़ादी के लिए अपने प्राणों तक का उत्सर्ग कर दिया और भारत से ब्रिटिश शासन को समाप्त कर स्वराज स्थापित करने का संकल्प लिया। इस आंदोलन में किसान, मजदूर, विद्यार्थी, महिलाएँ और बुद्धिजीवी सहित समाज के हर वर्ग ने एकजुट होकर तन-मन-धन से योगदान दिया। स्वतंत्रता सेनानी सत्याग्रह, असहयोग और क्रांतिकारी गतिविधियों के माध्यम से आज़ादी की मशाल जलाते रहे, जबकि अंग्रेजी हुकूमत ने दमन, अत्याचार, गिरफ्तारी, लाठीचार्ज और गोलियों से इस जनांदोलन को कुचलने की हर संभव कोशिश की, फिर भी देशभक्तों का हौसला अडिग रहा और उनके महान बलिदान व संघर्ष ने अंततः भारत


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अनेक वीर क्रांतिकारियों के अदम्य साहस, त्याग और बलिदान से भरा हुआ है। इन महान सपूतों में एक नाम है वासुदेव बलवंत फड़के का, जिन्हें भारत में सशस्त्र क्रांति का प्रारंभिक सूत्रधार माना जाता है। उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संगठित विद्रोह छेड़कर स्वतंत्रता की नई चेतना जगाई और आदिवासी समुदायों को साथ लेकर ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी।
वासुदेव बलवंत फड़के का जन्म 4 नवंबर 1845 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के शिरढोणे गांव में हुआ था। बचपन से ही वे तेजस्वी, साहसी और स्वतंत्र स्वभाव के थे। उन्हें पहाड़ों और जंगलों में घूमना पसंद था। उनकी शिक्षा कल्याण और पुणे में हुई। परिवार चाहता था कि वे नौकरी करें, लेकिन फड़के के मन में कुछ बड़ा करने की इच्छा थी। बाद में वे पुणे के मिलिट्री एकाउंट्स डिपार्टमेंट में नौकरी करने लगे और लगभग 15 वर्षों तक वहीं कार्य किया।
इस दौरान वे कई राष्ट्रवादी विचारकों के संपर्क में आए। विशेष रूप से महादेव गोविन्द रानाडे के विचारों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उनके मन में अंग्रेजी शासन के प्रति असंतोष बढ़ता गया, लेकिन एक घटना ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।
साल 1871 में उन्हें सूचना मिली कि उनकी माता गंभीर रूप से बीमार हैं। उन्होंने अपने अंग्रेज अधिकारी से छुट्टी मांगी, लेकिन अधिकारी ने छुट्टी देने से इनकार कर दिया। यह अपमान उन्हें भीतर तक झकझोर गया। वे बिना अनुमति के घर पहुंचे, परंतु तब तक उनकी माता का देहांत हो चुका था। इस घटना ने उन्हें अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह के लिए प्रेरित कर दिया। उन्होंने तुरंत नौकरी छोड़ दी और स्वतंत्रता संग्राम के मार्ग पर चल पड़े।
फड़के ने देखा कि देशी रियासतों से उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है। तब उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज की गुरिल्ला युद्ध नीति अपनाने का निर्णय लिया। उन्होंने महाराष्ट्र के कोळी, भील, धांगड़ और अन्य आदिवासी समुदायों को संगठित कर “रामोशी” नाम से एक क्रांतिकारी संगठन बनाया। इस संगठन का उद्देश्य अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकना था।
साल 1879 में फड़के ने अंग्रेजों के विरुद्ध खुला विद्रोह छेड़ दिया। उन्होंने धनी अंग्रेज साहूकारों और सरकारी खजानों पर हमले कर धन एकत्र किया, ताकि क्रांति को मजबूत किया जा सके। उनकी गतिविधियों का प्रभाव महाराष्ट्र के सात जिलों तक फैल गया। अंग्रेज अधिकारी भयभीत हो गए और उन्हें पकड़ने के लिए विशेष अभियान शुरू किया गया।
13 मई 1879 की रात को फड़के अपने साथियों के साथ विश्रामबाग स्थित सरकारी भवन पहुंचे, जहां अंग्रेज अधिकारी बैठक कर रहे थे। उन्होंने अचानक हमला किया, भवन को आग लगा दी और अंग्रेज अधिकारियों को भारी नुकसान पहुंचाया। इसके बाद अंग्रेज सरकार ने उन्हें पकड़ने के लिए 50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया। जवाब में फड़के ने भी अंग्रेज अधिकारी के सिर पर इनाम घोषित कर अंग्रेजों को खुली चुनौती दे दी।
फड़के और अंग्रेजी सेना के बीच कई मुठभेड़ हुईं। उनकी गुरिल्ला रणनीति से अंग्रेज परेशान हो उठे। हालांकि समय के साथ उनकी सेना के पास गोला-बारूद कम होने लगा। वे कुछ समय के लिए पुणे के आसपास आदिवासी क्षेत्रों में छिप गए। लेकिन 20 जुलाई 1879 को बीमारी की हालत में एक मंदिर में विश्राम करते समय किसी मुखबिर की सूचना पर अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और प्रारंभ में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। बाद में एक प्रसिद्ध वकील की पैरवी के बाद उनकी सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया। उन्हें काला पानी की सजा देकर जेल भेज दिया गया। कठोर यातनाओं और कठिन परिस्थितियों के बीच 17 फरवरी 1883 को जेल में ही इस महान क्रांतिकारी ने अंतिम सांस ली।
वासुदेव बलवंत फड़के ने आदिवासियों और आम जनता को संगठित कर अंग्रेजी शासन को चुनौती दी। उनका संघर्ष भारत में सशस्त्र क्रांति की नींव साबित हुआ

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