उनकी स्मृति में यही विनम्र नमन —“वाणी बनी थी वज्र उनकी,गीत बने थे रण के तीर।भारत माता की सेवा में,समर्पित था जीवन धीर।”:-भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि कोटि नमन –न्यूज़ इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश बत्स

भारत की स्वतंत्रता संग्राम गाथा केवल तलवारों और नारों की कहानी नहीं है, वह त्याग, तपस्या और निस्वार्थ समर्पण का महासंगीत है। इसी महासंगीत की मधुरतम स्वर थीं Sarojini Naidu — जिनकी वाणी में कविता थी, पर हृदय में क्रांति की ज्वाला। 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद की पावन धरती पर जन्मी इस बालिका ने आगे चलकर राष्ट्र के स्वाभिमान की स्वर-सरिता बनकर इतिहास के पन्नों पर अमिट छाप छोड़ी।
महात्मा गांधी ने उन्हें ‘भारत कोकिला’ की उपाधि दी। यह केवल एक सम्मान नहीं था, बल्कि उस मधुर कंठ की पहचान थी जो गुलामी की बेड़ियों में जकड़े भारतवासियों के हृदय में आशा का संचार करता था। उनकी वाणी में ऐसी ओजस्विता थी कि सभाओं में बैठा हर श्रोता स्वतंत्रता के स्वप्न को साकार होते देखता था।
जब राष्ट्रपिता Mahatma Gandhi ने नमक सत्याग्रह का बिगुल फूंका और दांडी की ओर कदम बढ़ाए, तब सरोजिनी नायडू ने भी उसी साहस के साथ इस आंदोलन में भाग लिया। 1930 के ऐतिहासिक Dandi March में उन्होंने न केवल सहभागिता की, बल्कि अनेक अवसरों पर नेतृत्व भी संभाला। अंग्रेजी हुकूमत की कठोरता उनके हौसलों को झुका न सकी। जेल की दीवारें भी उनके संकल्प को कैद न कर सकीं।
राजनीति के क्षेत्र में भी उन्होंने इतिहास रचा। 1925 में कानपुर अधिवेशन में वे Indian National Congress की अध्यक्ष बनीं — यह गौरव प्राप्त करने वाली पहली भारतीय महिला। उस समय जब समाज में महिलाओं की भूमिका सीमित मानी जाती थी, तब सरोजिनी नायडू ने सिद्ध कर दिया कि राष्ट्र निर्माण में नारी शक्ति किसी भी प्रकार से कम नहीं। उनके नेतृत्व ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा और ऊर्जा प्रदान की।
स्वतंत्रता के पश्चात 1947 में उन्हें उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) की प्रथम महिला राज्यपाल नियुक्त किया गया। शासन के इस दायित्व को भी उन्होंने उसी गरिमा और निष्ठा से निभाया, जैसे स्वतंत्रता संग्राम का संघर्ष। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा देशभक्त पद और प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण से महान बनता है।
साहित्य के क्षेत्र में भी उनका योगदान अविस्मरणीय है। उनकी कृतियाँ — The Golden Threshold, The Bird of Time और The Broken Wing — भारतीय संवेदनाओं, प्रकृति-चित्रण और देशभक्ति के अनुपम उदाहरण हैं। उनकी कविताओं में जहां प्रेम की कोमलता थी, वहीं राष्ट्रप्रेम की तीव्रता भी। शब्द उनके लिए केवल अलंकार नहीं थे, वे स्वतंत्रता के शंखनाद थे।
सरोजिनी नायडू ने महिलाओं के अधिकारों के लिए भी मुखर स्वर उठाया। वे मानती थीं कि जब तक भारत की नारी शिक्षित और सशक्त नहीं होगी, तब तक स्वतंत्रता अधूरी रहेगी। उन्होंने नारी जागरण को स्वतंत्रता आंदोलन का अभिन्न अंग बनाया।
2 मार्च 1949 को यह अमर स्वर मौन हो गया, पर उनकी गूंज आज भी भारत के कण-कण में सुनाई देती है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि देशभक्ति केवल रणभूमि में नहीं, बल्कि कलम, वाणी और कर्म के माध्यम से भी प्रकट होती है।
आज जब हम स्वतंत्र भारत की खुली हवा में सांस लेते हैं, तब हमें उन दिवानों को स्मरण करना चाहिए जिन्होंने अपने सुख, अपने स्वार्थ और अपना सर्वस्व राष्ट्र के चरणों में अर्पित कर दिया। सरोजिनी नायडू ऐसी ही अमर विभूति थीं — जिनकी कविता में क्रांति थी, जिनकी मुस्कान में साहस था, और जिनकी आत्मा में बसता था भारत।

