NEWS INDIA AAJ TAK .EDITOR RAM PARKASH VATS
हिमाचल प्रदेश की राजधानी में पुलिस समन्वय को लेकर उपजा विवाद अब प्रशासनिक दायरे से निकलकर राजनीतिक संग्राम का रूप ले चुका है। रोहड़ू में दिल्ली पुलिस द्वारा तीन प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी और प्रदेश पुलिस को पूर्व सूचना न दिए जाने के मामले ने राज्य की खुफिया व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने इस घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए पुलिस महानिदेशक से विस्तृत रिपोर्ट तलब की है और भविष्य में ऐसी चूक न हो, इसके लिए समन्वय तंत्र को मजबूत करने के निर्देश दिए हैं।
खुफिया चूक पर सरकार सख्त
मुख्यमंत्री ने सचिवालय में डीजीपी अशोक तिवारी से पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली। सरकार की चिंता का मुख्य बिंदु यह रहा कि बाहरी राज्य की 13 सदस्यीय पुलिस टीम परवाणु से प्रवेश कर कई जिलों से गुजरते हुए रोहड़ू तक पहुंच गई, किंतु प्रदेश की खुफिया इकाई को इसकी पूर्व सूचना नहीं मिल सकी। इसे सूचना नेटवर्क की गंभीर विफलता माना जा रहा है।बताया गया है कि दिल्ली पुलिस की टीम आईपीएस अधिकारी राहुल विक्रम के नेतृत्व में तड़के रोहड़ू स्थित एक रिजॉर्ट में पहुंची और तीन प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया। स्थानीय पुलिस को औपचारिक सूचना न दिए जाने से अधिकार क्षेत्र को लेकर विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई।
मुख्य सचिव और डीजीपी की बैठक
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए मुख्य सचिव संजय गुप्ता ने डीजीपी को तलब कर विस्तृत बैठक की। करीब आधे घंटे चली बैठक में खुफिया इनपुट की कमी, अंतरराज्यीय समन्वय और कार्रवाई की प्रक्रिया पर चर्चा हुई। सूत्रों के अनुसार सरकार इस प्रकरण को प्रशासनिक ढांचे की परीक्षा के रूप में देख रही है।
सीआईडी में फेरबदल बना कारण?
सूत्रों का कहना है कि हाल के महीनों में सीआईडी में बड़े स्तर पर फेरबदल किए गए हैं। अनुभवी अधिकारियों और कर्मचारियों के स्थानांतरण के बाद नए स्टाफ की तैनाती से जमीनी नेटवर्क कमजोर हुआ है। करीब सौ से अधिक कर्मियों के तबादले के बाद सूचना संकलन और विश्लेषण की क्षमता प्रभावित हुई है। यही कारण माना जा रहा है कि बाहरी पुलिस टीम की गतिविधियों पर समय रहते अलर्ट जारी नहीं हो सका।विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी राज्य में खुफिया तंत्र का स्थानीय संपर्क ही उसकी सबसे बड़ी ताकत होता है। यदि वही ढीला पड़ जाए तो अंतरराज्यीय मूवमेंट पर निगरानी कमजोर होना स्वाभाविक है।
शिमला पुलिस की तत्परता से टला बड़ा विवाद
गिरफ्तारी की सूचना मिलते ही शिमला पुलिस ने आईएसबीटी, शोघी और धर्मपुर में नाकाबंदी कर वाहनों की जांच शुरू की। पुलिस की त्वरित कार्रवाई से संबंधित गाड़ियों को रोका गया और टीम को शिमला लाया गया। माना जा रहा है कि यदि टीम उत्तराखंड सीमा की ओर निकल जाती तो स्थिति और जटिल हो सकती थी। समय पर की गई कार्रवाई से संभावित प्रशासनिक संकट टल गया।
राज्यसभा चुनाव से जुड़ते सवाल
यह पहला अवसर नहीं है जब खुफिया तंत्र पर प्रश्न उठे हों। हालिया राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग की घटना के दौरान भी सटीक राजनीतिक इनपुट सामने नहीं आ पाए थे। उस चुनाव में कांग्रेस को झटका लगा और भाजपा प्रत्याशी हर्ष महाजन विजयी रहे। विपक्ष अब दोनों घटनाओं को जोड़कर सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है।
सियासत तेज, बयानबाजी चरम पर
घटना के बाद प्रदेश की राजनीति गरमा गई है। कांग्रेस ने इसे केंद्र सरकार की दखलंदाजी करार दिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष विनय कुमार ने कहा कि शांत हिमाचल को अशांत करने का प्रयास बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना सूचना गिरफ्तारी संघीय ढांचे की मर्यादा के खिलाफ है।
वहीं भाजपा ने राज्य सरकार पर कानून व्यवस्था की विफलता का आरोप लगाया है। भाजपा के मुख्य प्रवक्ता राकेश जम्वाल ने कहा कि देश की गरिमा से जुड़े आरोपों में कार्रवाई करने आई पुलिस को रोकना दुर्भाग्यपूर्ण है। भाजपा ने राज्यपाल को ज्ञापन सौंपकर सरकार से पांच बिंदुओं पर जवाब मांगा है।
संघीय ढांचे पर बहस
यह प्रकरण केवल पुलिस समन्वय का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकार क्षेत्र पर भी बहस छेड़ चुका है। सवाल उठ रहा है कि क्या अंतरराज्यीय कार्रवाई के लिए पूर्व सूचना अनिवार्य होनी चाहिए? क्या खुफिया नेटवर्क की पुनर्संरचना की आवश्यकता है?
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि सूचना तंत्र को मजबूत किया जाएगा और समन्वय प्रणाली की समीक्षा होगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार इस मौके को सुधार के अवसर में बदलती है तो प्रशासनिक विश्वसनीयता बहाल हो सकती है, अन्यथा विपक्ष इसे बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में भुनाने में पीछे नहीं रहेगा।फिलहाल, हिमाचल की राजनीति में यह विवाद आने वाले दिनों में और गहराने के संकेत दे रहा है। खुफिया नेटवर्क की मजबूती, पुलिस समन्वय और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह मामला राज्य की प्रशासनिक साख की परीक्षा बन चुका है।

