
********असलियत क्या है शिकायतकर्ता के मुखारविंद से सुनिऐ********
Bharmar /jawali. 25 Feb 2026/Main Office ,News Desk Editor Ram Parkash Vats
National Green Tribunal (एनजीटी) के आदेश के बाद ज्वाली विधानसभा की ग्राम पंचायत नाणा में जंगलात भूमि पर बनी करीब ढाई किलोमीटर लंबी सड़क की जांच ने प्रशासनिक गलियारों में खलबली मचा दी है। घने जंगल के बीच बने इस कथित रास्ते को लेकर वन एवं राजस्व विभाग की भूमिका सवालों के घेरे में है।
आला अधिकारी मौके पर, जंगल में पैनी नजर
जांच के लिए एसडीएम ज्वाली नरेंद्र सिंह जरियाल, डीएफओ नूरपुर संदीप कोहली और वाइल्ड लाइफ डीएफओ हमीरपुर रेजीनॉड रॉयलस्टोन दल-बल सहित मौके पर पहुंचे। टीम ने डोबा गांव से दिल्लू दीन के घर तक जंगल के भीतर बने रास्ते का निरीक्षण किया।
सूत्रों के अनुसार, मौके पर ताजा खुदाई और भारी मशीनरी के निशान दिखाई दिए हैं, जिससे यह आशंका और गहरा गई है कि हाल ही में जेसीबी जैसी मशीनों से रास्ता चौड़ा किया गया।
किसने दी इजाजत? लाखों की वन संपदा पर चला बुलडोजर?
शिकायतकर्ता एवं पूर्व प्रधान ओंकार सिंह ने आरोप लगाया है कि 2 से 2.5 किलोमीटर लंबा यह रास्ता घने जंगल को काटकर बनाया गया। उनका दावा है कि निर्माण के दौरान कीमती जड़ी-बूटियों, पेड़-पौधों और अन्य वन संपदा को भारी नुकसान पहुंचा है।
उन्होंने सवाल उठाया—
यदि यह रास्ता 40-50 वर्ष पुराना था, तो ताजा मशीनरी के निशान क्यों?
निर्माण कार्य पर खर्च की गई राशि कहां से आई?
क्या इसके लिए वन विभाग से विधिवत अनुमति ली गई?
6 मरले भूमि आबंटन भी जांच के घेरे में
मामले में नया मोड़ तब आया जब वर्ष 2020-21 में घने जंगल के बीच लगभग 6 मरले भूमि एक व्यक्ति को अलॉट किए जाने का मामला सामने आया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि संबंधित व्यक्ति के नाम पहले से पर्याप्त भूमि दर्ज है, ऐसे में यह आबंटन नियमों के विपरीत प्रतीत होता है।इन्हीं तथ्यों के आधार पर मामला एनजीटी तक पहुंचा।
क्या कहते हैं अधिकारी?
एसडीएम नरेंद्र सिंह जरियाल ने कहा,
“अलॉटमेंट के दस्तावेजों की जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी। यदि आबंटन अवैध पाया गया तो कार्रवाई करते हुए उसे रद्द किया जाएगा।”
डीएफओ संदीप कोहली
“स्थानीय लोगों के अनुसार यह रास्ता 40-50 वर्ष पुराना है। संबंधित व्यक्ति को 4-5 साल पहले भूमि अलॉट हुई है। जांच की जाएगी कि रास्ता किस प्रकार और कब बनाया गया।”हालांकि जेसीबी से निर्माण के सवाल पर उन्होंने स्पष्ट जवाब देने से परहेज किया और विस्तृत जांच की बात कही।
कानून क्या कहता है?
वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत किसी भी वन भूमि का गैर-वन प्रयोजन के लिए उपयोग करने से पहले केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है।
बिना अनुमति वन भूमि पर सड़क निर्माण दंडनीय अपराध है, जिसमें जुर्माना और कारावास दोनों का प्रावधान हो सकता है।यदि वन संपदा को नुकसान पहुंचाया गया है, तो संबंधित व्यक्तियों से क्षतिपूर्ति वसूली जा सकती है।
भूमि आबंटन प्रक्रिया में अनियमितता पाए जाने पर राजस्व रिकॉर्ड निरस्त कर प्रशासनिक कार्रवाई की जा सकती है।फिलहाल जांच जारी है, लेकिन सवाल बड़ा है—क्या जंगल की हरियाली पर किसी ने नियमों को दरकिनार कर डामर बिछा दिया? या फिर यह वर्षों पुराना रास्ता ही विवाद की जड़ है? जवाब जांच रिपोर्ट के बाद ही साफ होंगे, लेकिन इस मामले ने प्रशासनिक पारदर्शिता और पर्यावरण संरक्षण पर गंभीर प्रश्नचिह्न जरूर लगा दिए हैं।

