भारत स्वतत्र सैनानीयों को कोटि -कोटि नमन संपादक राम प्रकाश बत्स
जब भी भारत की स्वतंत्रता की बात होगी, एक नाम ज्वाला बनकर उठेगा — विनायक दामोदर सावरकर।
जन-जन के हृदय में जिनका स्वर “वीर सावरकर” बनकर गूंजता है।

28 मई 1883 को महाराष्ट्र की पुण्यभूमि नासिक में जन्मा वह बालक साधारण नहीं था। पिता दामोदरपंत और माता राधाबाई के संस्कारों ने उसके भीतर स्वाधीनता की ऐसी चिनगारी जलाई, जो आगे चलकर अग्निकुंड बन गई। कम आयु में ही माता-पिता का साया उठ गया, पर इस विपत्ति ने उसे झुकाया नहीं—बल्कि लौह-पुरुष बना दिया।
क्रांति की पहली शपथ
1899 में भाई गणेश सावरकर के साथ “मित्र मेला” की स्थापना कर उन्होंने युवाओं के भीतर राष्ट्रभक्ति का बीज बोया। आगे चलकर यही संगठन 1904 में “अभिनव भारत” बना—एक ऐसा गुप्त क्रांतिकारी केंद्र, जिसने अंग्रेजी सत्ता की नींव हिला दी।
पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज में विदेशी वस्त्रों की होली जलाने वाला वह युवा, केवल छात्र नहीं—आग का दरिया था। कानून की पढ़ाई के लिए लंदन पहुँचा, पर वहां भी चैन कहाँ? “इंडिया हाउस” और “फ्री इंडिया सोसाइटी” के माध्यम से उसने परदेश की धरती पर भी स्वतंत्रता का शंखनाद किया।
उन्होंने 1857 के संग्राम को केवल “विद्रोह” नहीं माना—बल्कि उसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता युद्ध सिद्ध किया। उनकी पुस्तक The Indian War of Independence 1857 ने क्रांति की विचारधारा को नई दिशा दी।
काला पानी की कालकोठरी
1910 में गिरफ्तारी। आरोप—नासिक के कलेक्टर जैक्सन की हत्या में संलिप्तता। निर्णय—दो आजीवन कारावास, अर्थात 50 वर्ष की सजा!
1911 में उन्हें अंडमान की कुख्यात सेलुलर जेल भेज दिया गया।
वहां की कालकोठरियाँ, तेल कोल्हू, बेड़ियों की झंकार, कोड़ों की मार—सबने उनके शरीर को तोड़ा, पर आत्मा को नहीं। पत्थर की दीवारों पर कील से कविताएँ उकेरने वाला वह क्रांतिकारी, यातनाओं के बीच भी अडिग रहा।
विचारों का योद्धा
कैद के दिनों में उन्होंने “हिंदुत्व: हिंदू कौन है?” की रचना की और हिंदुत्व की वैचारिक व्याख्या प्रस्तुत की। उनके लिए हिंदुत्व केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का भाव था।
उन्होंने समाज में व्याप्त अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाई। रत्नागिरी में मंदिर प्रवेश आंदोलन चलाया। मराठी भाषा को समृद्ध करते हुए “दिग्दर्शक”, “नेपथ्य”, “दूरध्वनी” जैसे शब्द गढ़े—वह केवल योद्धा नहीं, शब्द-शिल्पी भी थे।
अंतिम तपस्या
1924 में रिहा हुए, पर रत्नागिरी में नजरबंद रहे। 1937 से 1943 तक हिंदू महासभा के अध्यक्ष के रूप में सक्रिय राजनीति में भी योगदान दिया।
26 फरवरी 1966 को मुंबई में उन्होंने उपवास के माध्यम से स्वेच्छा से देह त्याग दी—इसे उन्होंने “आत्मार्पण” कहा। जीवन भर राष्ट्र के लिए जिए, और अंत भी उसी भावना में किया।
वीर सावरकर केवल एक नाम नहीं, एक विचार हैं—अडिग साहस का, राष्ट्रभक्ति का, और वैचारिक निर्भीकता का।
उनकी गाथा हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता केवल प्राप्त नहीं होती—उसे तप, त्याग और बलिदान से अर्जित करना पड़ता है।

