भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि -कोटि नमन संपादक राम प्रकाश बत्स
स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला जब भारत की धरती पर धधक रही थी, उसी समय एक और मौन क्रांति आकार ले रही थी—सामाजिक न्याय की क्रांति। उस क्रांति के अग्रदूत थे डॉ. भीमराव अंबेडकर — एक ऐसा नाम, जो केवल संविधान के पन्नों में नहीं, बल्कि करोड़ों वंचितों की आशा में जीवित है।
14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू में जन्मे इस बालक ने जन्म से ही भेदभाव की बेड़ियाँ देखीं। समाज ने उन्हें “अछूत” कहा, पर उन्होंने स्वयं को ज्ञान का योद्धा बनाया। विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने शिक्षा को अपना अस्त्र बनाया। कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से उच्चतम उपाधियाँ प्राप्त कर वे लौटे—सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि उस समाज के लिए जो सदियों से अधिकारों से वंचित था।

सन् 1927 में उन्होंने अस्पृश्यता के विरुद्ध बिगुल फूँका। महाड के चवदार तालाब पर “महार सत्याग्रह” केवल पानी का प्रश्न नहीं था—वह स्वाभिमान की लड़ाई थी। उन्होंने मनुस्मृति की प्रतियां जलाकर यह स्पष्ट कर दिया कि अन्यायपूर्ण परंपराएँ अब नहीं चलेंगी। कालाराम मंदिर आंदोलन के माध्यम से उन्होंने धार्मिक स्थलों में समान प्रवेश का अधिकार माँगा।
जब देश स्वतंत्र हुआ, तब उन्हें संविधान निर्माण समिति का अध्यक्ष बनाया गया। भारतीय लोकतंत्र की आत्मा—हमारा संविधान—उनकी दूरदर्शिता का प्रमाण है। उन्होंने कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन स्थापित किया, मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित किया और समानता को राष्ट्र की आधारशिला बनाया। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री बने, पर पद से अधिक उन्हें न्याय की चिंता थी।
जाति व्यवस्था की जकड़नों से व्यथित होकर उन्होंने 1956 में अपने हजारों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया। यह केवल धर्म परिवर्तन नहीं था, बल्कि आत्मसम्मान और मानवता की घोषणा थी।
6 दिसंबर 1956 को उनका महापरिनिर्वाण हुआ, पर उनका संघर्ष आज भी जीवित है।
डॉ. अंबेडकर ने सिखाया कि स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय से भी मुक्ति है।
उनकी कलम तलवार से अधिक प्रखर थी, और उनका जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि जब विचार जागते हैं, तो इतिहास बदल जाता है।

