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धारावाहिक (26) भारत क स्वतंत्र सैनानी:🇮🇳 चंद्रशेखर आज़ाद को शत-शत नमन।ऐसे वीर कम ही जन्म लेते हैं, जो हँसते-हँसते मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर कर दें।

RamParkash Vats
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धारावाहिक (26)भारत के स्वतंत्र सैनानी:संपादकीय लेख राम प्रकाश बत्स

भारत की स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं थी, वह अनगिनत बलिदानों की अग्नि में तपकर अर्जित की गई थी। Bhagat Singh की निर्भीक हंसी फाँसी के फंदे पर भी गूंजती रही, Chandra Shekhar Azad ने अंतिम गोली स्वयं पर चलाकर पराधीनता को चुनौती दी, Rani Lakshmibai ने रणभूमि में शौर्य की अमर गाथा लिखी, और Subhas Chandra Bose ने “तुम मुझे खून दो…” का आह्वान कर युवाओं की रगों में ज्वाला भर दी। ये वे नाम हैं जिन्हें इतिहास ने दर्ज किया, पर असली कथा उन लाखों गुमनाम स्त्री-पुरुषों की भी है जिन्होंने जेलों की यातना सही, गोलियों के सामने सीना ताना और परिवारों से बिछुड़कर राष्ट्र को अपना सब कुछ अर्पित कर दिया। उनका संघर्ष केवल अंग्रेजी शासन के विरुद्ध नहीं था, वह आत्मसम्मान, स्वाभिमान और अपने भविष्य को स्वयं गढ़ने के अधिकार की लड़ाई थी। आज जब हम स्वतंत्र हवा में सांस लेते हैं, तो यह समझना जरूरी है कि इस आज़ादी की हर धड़कन में उनके त्याग का स्पंदन है। उनका बलिदान हमें केवल गौरव नहीं देता, बल्कि यह जिम्मेदारी भी सौंपता है कि हम इस स्वतंत्रता को सजगता, एकता और नैतिक साहस से सहेज कर रखें।

चंद्रशेखर आज़ाद को शत-शत नमन।ऐसे वीर कम ही जन्म लेते हैं, जो हँसते-हँसते मातृभूमि पर सर्वस्व न्योछावर कर दें।

23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भावरा ग्राम (आज का आज़ाद नगर) में जन्मे आज़ाद ने किशोरावस्था में ही अंग्रेजी हुकूमत को ललकार दिया। 1921 में गिरफ्तारी के समय जब उनसे नाम पूछा गया, तो उन्होंने गर्व से कहा—“नाम: आज़ाद, पिता का नाम: स्वतंत्र, निवास: जेल।”यह केवल उत्तर नहीं, बल्कि जीवनभर निभाई गई प्रतिज्ञा थी।असहयोग आंदोलन के स्थगित होने के बाद उन्होंने सशस्त्र क्रांति का मार्ग चुना और Hindustan Socialist Republican Association (HSRA) के प्रमुख स्तंभ बने।

1925 का काकोरी कांड और 1928 में लाला लाजपत राय की मृत्यु का प्रतिशोध लेते हुए सांडर्स वध—इन घटनाओं ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी।27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में जब वे पुलिस से घिर गए, तो अपनी प्रतिज्ञा निभाते हुए अंतिम गोली स्वयं पर चला दी। वे अंग्रेजों के हाथ जीवित नहीं आए—और इसी के साथ अमर हो गए।

उनका जीवन केवल संघर्ष की कथा नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, साहस और अदम्य देशभक्ति का प्रतीक है।आज भी जब स्वतंत्रता की बात होती है, तो आज़ाद की गूँज सुनाई देती है—“दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे,आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे।”ऐसे अमर क्रांतिकारी को कोटि-कोटि नमन।

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