चिंतन मंथन और विश्लेषण, संपादक राम प्रकाश बत्स
हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा लागू की गई नई आबकारी नीति को आर्थिक सुधार के कदम के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। तर्क दिया जा रहा है कि इससे राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और नकली शराब पर रोक लगेगी। परंतु प्रश्न यह है कि क्या केवल आय बढ़ाने की दृष्टि से लिया गया निर्णय समाज की नस्ल, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के हित में भी होगा?
नई नीति के तहत यात्रा के दौरान दो के स्थान पर छह बोतलें ले जाने की अनुमति, सामाजिक आयोजनों में 72 बोतलें और 78 बीयर परोसने की छूट—ये सब संकेत देते हैं कि नियंत्रण की जगह सुविधा को प्राथमिकता दी गई है। सरकार का कहना है कि प्रत्येक बोतल पर क्यूआर कोड और होलोग्राम से अवैध कारोबार पर अंकुश लगेगा। किंतु व्यवहारिक धरातल पर अनुभव बताता है कि शराब माफिया अक्सर सरकारी तंत्र से दो कदम आगे चलता है। कहावत है—“तू डाल-डाल, मैं पात-पात।” केवल तकनीकी उपायों से अवैध व्यापार पूरी तरह समाप्त हो जाएगा, यह मान लेना यथार्थ से आँख मूंदना होगा।
हिमाचल जैसे शांत और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील प्रदेश में शराब की उपलब्धता को सहज बनाना सामाजिक ताने-बाने पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है। युवा पीढ़ी में बढ़ती लत, घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाएँ और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ—ये वे साए हैं जिन्हें राजस्व की चमक में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्या हम अल्पकालिक आय के लिए दीर्घकालिक सामाजिक कीमत चुकाने को तैयार हैं?
आर्थिक संकट से उबरने के लिए राज्य को ठोस औद्योगिक नीति, पर्यटन का सुदृढ़ीकरण, कृषि-उद्यम और कौशल विकास जैसे स्थायी उपायों पर ध्यान देना चाहिए। केवल आबकारी से प्राप्त आय पर निर्भरता राज्य को राजस्व के जाल में उलझा सकती है।
Himachal Pradesh की पहचान देवभूमि के रूप में है—संयम, संस्कृति और संतुलन की भूमि के रूप में। यदि नीति निर्माण में यह संतुलन खो गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ प्रश्न करेंगी कि क्या आर्थिक मजबूरी में समाज की सेहत दांव पर लगा दी गई थी।
सरकार को चाहिए कि वह राजस्व वृद्धि के साथ-साथ सामाजिक प्रभावों का भी व्यापक अध्ययन कराए और जनमत को गंभीरता से सुने। क्योंकि अंततः किसी भी नीति की सफलता आंकड़ों से नहीं, समाज की स्थिरता और संतुलन से मापी जाती है।

