भारत के स्वाभिमानी स्वतंत्र सैनानी धारावाहिक (24) संपादकीय लेख भारत के सस्वतंत्र सैनानीयों को कोटि कोटि नमन संपादक राम प्रकाश वत्स
रानी लक्ष्मीबाई : संपूर्ण इतिहासभारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई का नाम अदम्य साहस, राष्ट्रभक्ति और आत्मसम्मान के प्रतीक के रूप में अमर है। वे 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की अग्रणी वीरांगना थीं, जिन्होंने अंग्रेज़ों की साम्राज्यवादी नीतियों को चुनौती देते हुए इतिहास की दिशा बदल दी।
प्रारंभिक जीवन: रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में हुआ था। उनका बचपन का नाम मणिकर्णिका था और परिवार में उन्हें ‘मनु’ कहा जाता था। उनके पिता मोरोपंत तांबे और माता भागीरथीबाई धार्मिक एवं संस्कारी प्रवृत्ति के थे। बचपन में ही माता का देहांत हो गया, जिसके बाद मनु का पालन-पोषण उनके पिता ने किया।मनु बचपन से ही असाधारण प्रतिभाशाली और निर्भीक थीं। उन्होंने घुड़सवारी, तलवारबाज़ी, भाला चलाना और निशानेबाज़ी सीखी। वे ‘सरंगी’, ‘पवन’ और ‘बादल’ नामक घोड़ों पर निपुणता से सवार होती थीं। उनका यह युद्धक प्रशिक्षण आगे चलकर उनके जीवन का आधार बना।
विवाह और झाँसी की रानी बनना: सन 1842 में उनका विवाह गंगाधर राव से हुआ, जो झाँसी के राजा थे। विवाह के बाद वे लक्ष्मीबाई कहलायीं। 1851 में उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ, किंतु कुछ ही महीनों में उसका निधन हो गया। इसके बाद उन्होंने दत्तक पुत्र दामोदर राव को गोद लिया।
अंग्रेज़ों की हड़प नीति और संघर्ष:उस समय भारत में अंग्रेज़ों का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों में था। गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी ने ‘Doctrine of Lapse’ (हड़प नीति) लागू की थी, जिसके अनुसार यदि किसी राजा का सगा उत्तराधिकारी न हो तो राज्य अंग्रेज़ों के अधीन कर लिया जाता था।
1853 में गंगाधर राव की मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों ने दामोदर राव को उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और झाँसी को अपने अधिकार में लेने का प्रयास किया। इस अन्याय के विरुद्ध रानी लक्ष्मीबाई ने स्पष्ट शब्दों में कहा— “मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी।”यहीं से उनके संघर्ष का निर्णायक अध्याय प्रारंभ हुआ।
1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम:1857 में मेरठ से आरंभ हुआ विद्रोह धीरे-धीरे पूरे उत्तर भारत में फैल गया। झाँसी भी इस क्रांति का केंद्र बन गई। रानी लक्ष्मीबाई ने स्वयं सेना का संगठन किया, किले की सुरक्षा मजबूत की और युद्ध की तैयारी की।1858 में ब्रिटिश सेना के जनरल ह्यूग रोज ने झाँसी पर आक्रमण किया।
लगभग 14 दिनों तक भीषण युद्ध चला:रानी ने अद्भुत वीरता का परिचय दिया। कहा जाता है कि वे अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बाँधकर घोड़े पर सवार होकर रणभूमि में उतरीं।जब झाँसी का किला चारों ओर से घिर गया, तब वे साहसपूर्वक किले से निकलकर कालपी पहुँचीं और वहाँ तात्या टोपे सहित अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर पुनः अंग्रेज़ों का सामना किया।
ग्वालियर और अंतिम युद्ध :कालपी के बाद रानी और उनके साथियों ने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया। किंतु अंग्रेज़ी सेना ने पुनः आक्रमण किया। 18 जून 1858 को कोटा-की-सराय के समीप भीषण युद्ध हुआ। युद्ध करते हुए रानी गंभीर रूप से घायल हो गईं और मात्र 29 वर्ष की आयु में वीरगति को प्राप्त हुईं। उनकी वीरता से प्रभावित होकर जनरल ह्यूग रोज ने उन्हें “भारतीय विद्रोहियों में सबसे बहादुर और श्रेष्ठ सैन्य नेता” कहा था।
रानी लक्ष्मीबाई केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि भारतीय नारी शक्ति की प्रतीक बन गईं। उनका जीवन साहस, आत्मसम्मान और देशभक्ति का अद्वितीय उदाहरण है। कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियाँ आज भी जनमानस में गूंजती हैं—“खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी।”आज भी उनका नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस और बलिदान की अमर प्रेरणा हैं।

