संपादकीय चिंतन, मंथन और विश्लेषण: संपादक राम प्रकाश वत्स
प्राकृतिक संसाधन किसी भी राज्य की अमूल्य धरोहर होते हैं। पहाड़, नदियाँ, जंगल और भूमि केवल आर्थिक विकास के साधन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की साझा पूंजी हैं। ऐसे में खनन गतिविधियों को लेकर गंभीर चिंतन और कठोर नीति-प्रवर्तन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। विकास की दौड़ में यदि पर्यावरणीय संतुलन को अनदेखा किया गया, तो उसके दुष्परिणाम समाज को लंबे समय तक भुगतने पड़ेंगे।
खनन से राजस्व प्राप्ति, रोजगार सृजन और निर्माण कार्यों के लिए कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित होती है। सड़क, पुल, भवन और आधारभूत ढांचे के विकास में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन जब यही खनन अनियंत्रित, अवैध और नियमों की अनदेखी करते हुए किया जाता है, तो यह वरदान से अभिशाप बन जाता है। विशेषकर पर्वतीय राज्यों में अवैध खनन से भूस्खलन, जलस्रोतों का सूखना, कृषि भूमि का कटाव और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी गंभीर समस्याएँ सामने आती हैं।
हिमालयी क्षेत्र, जो देश की जीवनदायिनी नदियों का उद्गम स्थल है, वहां खनन को लेकर अतिरिक्त सतर्कता अपेक्षित है। नदियों के तटों से अत्यधिक मात्रा में रेत, बजरी और पत्थर निकाले जाने से नदी की धारा बदल जाती है, जल स्तर गिरता है और आसपास की पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कई स्थानों पर पुलों की नींव कमजोर होने और सड़कों के धंसने की घटनाएँ भी सामने आई हैं, जिनके पीछे अवैध खनन एक प्रमुख कारण माना जाता है।
यह भी देखा गया है कि खनन माफिया प्रशासनिक ढांचे में सेंध लगाकर नियमों को दरकिनार कर देते हैं। रात के अंधेरे में मशीनों की गड़गड़ाहट और ट्रकों की आवाजाही स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ाती है। जब शिकायतों के बावजूद त्वरित कार्रवाई नहीं होती, तो शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगने लगते हैं। इसलिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसका प्रभावी क्रियान्वयन अधिक महत्वपूर्ण है।
सख्ती का अर्थ केवल जुर्माना बढ़ाना नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था को तकनीकी रूप से मजबूत बनाना भी है। जीपीएस आधारित ट्रैकिंग, ड्रोन सर्विलांस, ऑनलाइन परमिट प्रणाली और खनन क्षेत्रों की नियमित ऑडिटिंग जैसे उपाय पारदर्शिता ला सकते हैं। साथ ही स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना भी जरूरी है। ग्राम पंचायतों और सामाजिक संगठनों को निगरानी प्रक्रिया में शामिल किया जाए तो अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाना आसान होगा।
पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) की प्रक्रिया को भी कठोर और निष्पक्ष बनाना होगा। अक्सर यह आरोप लगते रहे हैं कि औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए रिपोर्ट तैयार कर ली जाती है, जबकि जमीनी सच्चाई कुछ और होती है। यदि वैज्ञानिक अध्ययन और दीर्घकालिक प्रभावों को ध्यान में रखकर अनुमति दी जाए, तो विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है।
खनन से प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्वास और पुनर्स्थापन पर भी गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। जहां खनन कार्य पूर्ण हो चुका है, वहां वृक्षारोपण, भूमि समतलीकरण और जल संरक्षण के उपाय अनिवार्य किए जाएं। कंपनियों को उनकी सामाजिक जिम्मेदारी के तहत स्थानीय विकास कार्यों में योगदान देना चाहिए। केवल संसाधन निकाल लेना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उस क्षेत्र को पुनर्जीवित करना भी उतना ही आवश्यक है।
राज्य सरकारों को चाहिए कि वे स्पष्ट नीति बनाकर खनन की सीमा तय करें और संवेदनशील क्षेत्रों में पूर्ण प्रतिबंध लागू करें। न्यायालयों द्वारा समय-समय पर दिए गए निर्देशों का पालन भी सुनिश्चित किया जाए। साथ ही आम नागरिकों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना भी आवश्यक है। जब समाज स्वयं सजग होगा, तब अवैध गतिविधियों के लिए स्थान सीमित हो जाएगा।
अंततः, प्रश्न केवल खनन का नहीं, बल्कि विकास की दिशा और दृष्टि का है। यदि हम अल्पकालिक लाभ के लिए प्राकृतिक संतुलन को क्षति पहुँचाते रहेंगे, तो दीर्घकाल में सामाजिक और आर्थिक संकट अपरिहार्य हो जाएंगे। इसलिए आवश्यक है कि खनन पर गंभीर मनन हो, नीतियों में पारदर्शिता हो और नियमों के उल्लंघन पर कठोर सख्ती बरती जाए। यही संतुलित और सतत विकास का मार्ग है, जो पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और समाज—तीनों के हितों की रक्षा कर सकता है।
संपादकीय:अवैध खनन पर कठोर सख्ती आवश्यक, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लिए प्रभावी नीति व सशक्त निगरानी व्यवस्था लागू करने की जरूरत
Leave a comment
Leave a comment

