धारावाहिक भारत के स्वतंत्र सैनानी (23) महात्मा गांधी:वे शरीर से भले ही हमारे बीच नहीं हैं, परंतु उनके विचार और आदर्श सदैव राष्ट्र की आत्मा में जीवित रहेंगे। भारत की स्वतंत्रता की कहानी में गांधीजी का नाम सदा अमर रहेगा —धारावाहिक भारत के स्वतंत्र सैनानी (23) महात्मा गांधी:भारत के स्वतंत्र सेनानी महात्मा गांधी: (मोहनदास करमचंद गांधी जी) संपादक राम प्रकाश वत्स

महात्मा गांधी : राष्ट्रचेतना के अमर प्रकाश
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, उसमें महात्मा गांधी का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। मोहनदास करमचंद गांधी केवल एक राजनीतिक नेता नहीं थे, बल्कि वे राष्ट्रीय चेतना, नैतिक शक्ति और जन-आंदोलन के प्रतीक थे। सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित उनका संघर्ष न केवल भारत को स्वतंत्रता दिलाने का माध्यम बना, बल्कि पूरी दुनिया के लिए नैतिक राजनीति का आदर्श भी स्थापित किया।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ। उनके पिता करमचंद गांधी पोरबंदर रियासत के दीवान थे और माता पुतलीबाई धार्मिक एवं संस्कारवान महिला थीं। बालक मोहनदास के व्यक्तित्व पर माता के धार्मिक संस्कारों और सत्यनिष्ठा का गहरा प्रभाव पड़ा। 1888 में वे कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए। वहां उन्होंने पश्चिमी सभ्यता को निकट से देखा, किंतु भारतीय मूल्यों को नहीं छोड़ा। 1891 में बैरिस्टर बनकर वे भारत लौटे, परंतु वकालत में अपेक्षित सफलता नहीं मिली।

दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष: सत्याग्रह का जन्म
1893 में गांधीजी एक कानूनी मामले के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका गए। वहां भारतीयों के साथ हो रहे नस्लीय भेदभाव ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। ट्रेन से निकाले जाने की घटना ने उन्हें झकझोर दिया। यहीं से उनके संघर्ष का आरंभ हुआ। 1893 से 1914 तक उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन चलाया। इसी काल में उन्होंने ‘सत्याग्रह’ की अवधारणा विकसित की — अन्याय के विरुद्ध अहिंसक प्रतिरोध।
सत्याग्रह केवल विरोध का तरीका नहीं था, बल्कि नैतिक शक्ति का प्रदर्शन था। गांधीजी का विश्वास था कि सत्य और प्रेम की शक्ति अंततः हिंसा पर विजय प्राप्त करती है। दक्षिण अफ्रीका का अनुभव उनके लिए प्रयोगशाला सिद्ध हुआ, जिसने उन्हें भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के लिए तैयार किया।

भारत वापसी और राष्ट्रीय आंदोलन में नेतृत्व
1915 में गांधीजी भारत लौटे और साबरमती आश्रम की स्थापना की। यह आश्रम उनके सामाजिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक प्रयोगों का केंद्र बना। उन्होंने देश की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए व्यापक यात्राएं कीं और किसानों, मजदूरों तथा आम जनता से सीधे संवाद स्थापित किया।
चंपारण और खेड़ा सत्याग्रह
1917 में बिहार के चंपारण में नील किसानों की समस्याओं को लेकर गांधीजी ने अपना पहला बड़ा सत्याग्रह किया। इसके बाद गुजरात के खेड़ा में किसानों के कर माफी के लिए आंदोलन चलाया। इन आंदोलनों ने उन्हें राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित कर दिया।
असहयोग आंदोलन (1920-1922)
जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद गांधीजी ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार, सरकारी पदों का त्याग और स्वदेशी अपनाने का आह्वान किया गया। यह आंदोलन जन-आंदोलन बन गया। हालांकि चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया, क्योंकि वे किसी भी कीमत पर हिंसा को स्वीकार नहीं कर सकते थे।
दांडी मार्च और नमक सत्याग्रह (1930)
1930 में नमक कानून के विरोध में गांधीजी ने ऐतिहासिक दांडी यात्रा प्रारंभ की। दांडी मार्च के तहत उन्होंने साबरमती से दांडी तक 240 मील की पैदल यात्रा की और समुद्र से नमक बनाकर ब्रिटिश कानून को चुनौती दी। यह प्रतीकात्मक कदम पूरे देश में जन-विद्रोह का कारण बना और विश्व का ध्यान भारत की स्वतंत्रता की ओर आकर्षित हुआ।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1942 में गांधीजी ने ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन का आह्वान किया। उनका नारा था — “करो या मरो।” भारत छोड़ो आंदोलन ने स्वतंत्रता संग्राम को निर्णायक दिशा दी। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें और अन्य नेताओं को जेल में डाल दिया, लेकिन जनता का उत्साह कम नहीं हुआ।
विचारधारा और सामाजिक सुधार
गांधीजी की राजनीति केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं थी। वे सामाजिक परिवर्तन के भी पक्षधर थे। उन्होंने छुआछूत उन्मूलन, महिला सशक्तिकरण और सांप्रदायिक एकता पर जोर दिया। वे ‘हरिजन’ शब्द का प्रयोग दलितों के सम्मान के लिए करते थे।
चरखा और खादी उनके स्वावलंबन के प्रतीक थे। वे मानते थे कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है, इसलिए ग्राम स्वराज उनका स्वप्न था। उनकी आर्थिक विचारधारा ‘ट्रस्टीशिप’ पर आधारित थी, जिसमें संपन्न वर्ग समाज के हित में अपनी संपत्ति का उपयोग करे।
विभाजन और अंतिम दिन
1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली, किंतु देश का विभाजन गांधीजी के लिए गहरा आघात था। वे सांप्रदायिक हिंसा से अत्यंत व्यथित थे और शांति स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयासरत रहे। 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली के बिड़ला भवन में प्रार्थना सभा के दौरान नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी। इस दुखद घटना ने पूरे राष्ट्र को शोकाकुल कर दिया।
वैश्विक प्रभाव और विरासत
गांधीजी के विचारों ने विश्व को भी प्रभावित किया। Martin Luther King Jr. और Nelson Mandela जैसे नेताओं ने उनके अहिंसक संघर्ष से प्रेरणा ली। 2 अक्टूबर को विश्वभर में ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
गांधीजी को ‘महात्मा’ और ‘बापू’ कहकर सम्मानित किया जाता है। वे केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि नैतिक शक्ति के प्रतीक हैं। आज जब विश्व हिंसा, असहिष्णुता और नैतिक संकटों से जूझ रहा है, तब गांधीजी का संदेश और भी प्रासंगिक हो उठता है।
महात्मा गांधी का जीवन हमें सिखाता है कि सत्य, अहिंसा और नैतिक साहस से किसी भी अन्याय का सामना किया जा सकता है। उनका राष्ट्रीय योगदान केवल भारत की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है; उन्होंने राजनीति को नैतिकता से जोड़ा और जन-आंदोलन को एक नई दिशा दी।
वे शरीर से भले ही हमारे बीच नहीं हैं, परंतु उनके विचार और आदर्श सदैव राष्ट्र की आत्मा में जीवित रहेंगे। भारत की स्वतंत्रता की कहानी में गांधीजी का नाम सदा अमर रहेगा — एक ऐसे नेता के रूप में जिसने बिना हथियार उठाए साम्राज्य की नींव हिला दी।

