
हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां निर्णयों की देरी अब विकल्प नहीं रह गई है। राजस्व घाटा अनुदान (RDG) बंद होने के बाद राज्य की वित्तीय संरचना पर अभूतपूर्व दबाव बढ़ा है। केंद्र से मिलने वाली इस महत्वपूर्ण सहायता के रुकने से प्रदेश की आय-व्यय संतुलन की तस्वीर और अधिक चिंताजनक हो गई है। ऐसे में आशंका स्वाभाविक है कि आने वाले समय में जनता पर करों का बोझ बढ़ सकता है, क्योंकि सरकार के पास संसाधन जुटाने के सीमित विकल्प बचे हैं।
प्रदेश में 29 बोर्ड और निगम कार्यरत हैं, जिनमें से 12 लगातार घाटे में चल रहे हैं। इनका कुल संचयी घाटा 31 मार्च 2025 तक ₹6454.47 करोड़ तक पहुंच चुका है। बिजली बोर्ड, एचआरटीसी और राज्य ऊर्जा निगम जैसे बड़े उपक्रम भारी वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं। अकेले बिजली बोर्ड पर ₹3246.97 करोड़ और एचआरटीसी पर लगभग ₹2200 करोड़ का घाटा दर्ज है। यह केवल आंकड़े नहीं, बल्कि राज्य के खजाने पर बढ़ते दबाव की गंभीर चेतावनी हैं।
वित्त विभाग ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि अब आर्थिक रूप से अक्षम इकाइयों पर कठोर निर्णय लेने का समय आ गया है। घाटे में चल रहे 12 बोर्डों और निगमों को मर्ज या बंद करने पर गंभीरता से विचार हो रहा है। यह प्रस्ताव कोई नया नहीं है; पिछले दो दशकों से इस पर चर्चा होती रही, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में निर्णय टलते रहे। अब जब हालात अधिक जटिल हो चुके हैं, सरकार इसे टालने की स्थिति में नहीं दिखती।
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) भी अपनी रिपोर्टों में बार-बार चेतावनी देता रहा है कि इन सार्वजनिक उपक्रमों का घाटा अंततः राज्य के राजकोष पर अतिरिक्त बोझ बनता जा रहा है। सवाल यह है कि क्या सरकार अब इस चेतावनी को अंतिम संकेत मानेगी?
स्थिति की विडंबना यह है कि कई घाटे वाले निगम सामाजिक दृष्टि से आवश्यक हैं। एचआरटीसी दूरस्थ क्षेत्रों की जीवनरेखा है, बिजली बोर्ड राज्य की ऊर्जा जरूरतों का आधार है। इन्हें बंद करना व्यावहारिक नहीं, लेकिन इनके पुनर्गठन और व्यावसायिक सुधार की आवश्यकता अनिवार्य है। वहीं कुछ औद्योगिक या विकास निगमों के विलय की संभावना से प्रशासनिक खर्च घटाया जा सकता है।
सरकार हर वर्ष भारी सब्सिडी भी वहन कर रही है—विद्युत उपदान पर लगभग ₹1200 करोड़, एचआरटीसी को ₹800 करोड़, सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर ₹250-300 करोड़ और केंद्र प्रायोजित योजनाओं में हिस्सेदारी के रूप में लगभग ₹1000 करोड़। जब आय सीमित और व्यय बेलगाम हो, तो वित्तीय संतुलन बिगड़ना तय है।
इस पूरी परिस्थिति में ओल्ड पेंशन स्कीम (ओपीएस) भी राज्य की वित्तीय योजना के लिए “गले की फांस” बनती दिख रही है। कर्मचारियों के हितों की रक्षा आवश्यक है, परंतु दीर्घकालिक देनदारियों का आकलन किए बिना लिए गए निर्णय भविष्य की पीढ़ियों पर बोझ बन सकते हैं। पेंशन व्यय लगातार बढ़ रहा है, और यदि राजस्व स्रोत नहीं बढ़े तो यह संकट और गहरा सकता है।
हिमाचल जैसे छोटे और सीमित संसाधनों वाले पहाड़ी राज्य के लिए वित्तीय अनुशासन केवल विकल्प नहीं, अनिवार्यता है। यदि सरकार कर बढ़ाती है तो उसका सीधा प्रभाव आम जनता और उद्योगों पर पड़ेगा। यदि घाटे वाले निगमों पर कार्रवाई करती है तो राजनीतिक और सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ेगा। दोनों ही स्थितियां चुनौतीपूर्ण हैं।
यह समय दोषारोपण का नहीं, बल्कि ठोस और पारदर्शी आर्थिक सुधारों का है। सरकार को चाहिए कि वह व्यापक वित्तीय पुनर्गठन की स्पष्ट नीति जनता के सामने रखे—कौन से निगम मर्ज होंगे, किनका पुनर्गठन होगा, और किन पर ताला लगेगा। साथ ही, राजस्व बढ़ाने के दीर्घकालिक उपाय—पर्यटन, हरित ऊर्जा, कृषि प्रसंस्करण और आईटी जैसे क्षेत्रों में निवेश—को प्राथमिकता दी जाए।
हिमाचल की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए कठोर निर्णयों से बचना अब संभव नहीं। सवाल यह है कि क्या सरकार समय रहते साहस दिखाएगी, या फिर वित्तीय दबाव जनता पर करों के रूप में उतरता रहेगा? आने वाले महीनों में लिए जाने वाले फैसले ही प्रदेश की आर्थिक दिशा तय करेंगे।

