सराहां की पावन धरती से मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने जनसभा को संबोधित करते हुए जो हुंकार भरी, वह केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि हिमाचल के हक की आवाज थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह लड़ाई किसी सरकार की नहीं, बल्कि प्रदेश की अस्मिता और अधिकारों की है।
आरडीजी के मुद्दे पर भाजपा को घेरते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि सर्वदलीय बैठक में सच्चाई सबके सामने आ गई। जब हिमाचल के अधिकार की बात आई तो भाजपा के नेता मौन साध गए। उन्होंने दो टूक कहा—“राजस्व घाटा अनुदान कोई खैरात नहीं, यह हिमाचल का संवैधानिक अधिकार है।”
प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. वाई.एस. परमार को याद करते हुए उन्होंने कहा कि धारा 118 जैसे ऐतिहासिक प्रावधान प्रदेश की जमीन और सम्मान की रक्षा के लिए बनाए गए थे, और वर्तमान सरकार उन्हीं पदचिह्नों पर चल रही है। उन्होंने 16वें वित्त आयोग द्वारा पुरानी व्यवस्था समाप्त किए जाने पर चिंता जताई और भाजपा को चुनौती दी कि यदि वह सचमुच हिमाचल हितैषी है तो प्रधानमंत्री से मिलकर आरडीजी बहाल करवाए।
पूर्व भाजपा सरकार पर प्रहार करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि पाँच वर्षों में मिली अतिरिक्त 70 हजार करोड़ की राशि का सदुपयोग नहीं किया गया। परिणामस्वरूप प्रदेश कर्ज और देनदारियों के बोझ तले दब गया। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव से पहले रेवड़ियाँ बाँटी गईं और संसाधनों का दुरुपयोग हुआ।
अग्निवीर योजना पर उन्होंने कहा कि हिमाचल के युवाओं की देशभक्ति से खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। साथ ही, आपदा प्रभावितों को दी जाने वाली सहायता डेढ़ लाख से बढ़ाकर आठ लाख करने और 6000 अनाथ बच्चों को “चिल्ड्रन ऑफ द स्टेट” के रूप में अपनाने जैसे निर्णयों को व्यवस्था परिवर्तन की दिशा बताया।
अपने भाषण के अंत में मुख्यमंत्री ने दृढ़ स्वर में कहा—“मैं चुनौतियों से घबराने वाला नहीं, लड़कर जीतने की क्षमता रखता हूं। हिमाचल का हक लेकर रहेंगे।”
जनसभा को संबोधित करते हुए जो हुंकार भरी, वह केवल एक राजनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि हिमाचल के हक की आवाज थी।
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