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हिमाचल के अधिकारों की लड़ाई तेज, आरडीजी–ओपीएस पर सुक्खू का केंद्र और विपक्ष पर सीधा हमला, भाजपा को पीएम से मिलने की चुनौत

RamParkash Vats
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मुख्यकार्यालय, हिमाचल न्यूज़ डैक्स10 फरबरी 2026 संपादक राम प्रकाश वत्स

शिमला की पहाड़ियों में राजनीति की गूंज आज कुछ अलग थी। ठंडी हवा के बीच सत्ता और विपक्ष की तपिश साफ महसूस हो रही थी। राजधानी से नई दिल्ली रवाना होने से पहले मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में न केवल अपनी सरकार की प्राथमिकताएं गिनाईं, बल्कि विपक्ष पर तीखे सियासी तीर भी छोड़े। उनकी बातों में आत्मविश्वास था, लहजे में संघर्ष की झलक और शब्दों में हिमाचल के अधिकारों की पीड़ा।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने का समय मांगा है। संसद सत्र चल रहा है, जैसे ही समय मिलेगा, वह दिल्ली जाकर हिमाचल प्रदेश के संवैधानिक अधिकारों की बात रखेंगे। उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि राज्य सरकार न तो ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) को बंद होने देगी और न ही किसी कर्मचारी का वेतन या पेंशनर की पेंशन रुकने देगी। यह बयान उन हजारों कर्मचारियों के लिए भरोसे की सांस जैसा था, जिनकी निगाहें सरकार के फैसलों पर टिकी हैं।
राजस्व घाटा अनुदान यानी आरडीजी के मुद्दे पर मुख्यमंत्री का स्वर और भी मुखर हो गया। उन्होंने कहा कि वित्त विभाग की प्रस्तुति में भाग लेने के लिए उन्होंने खुद नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर को पत्र लिखकर आमंत्रित किया था, लेकिन अब वह यह कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं कि उन्हें चिट्ठी वित्त सचिव के माध्यम से मिली। मुख्यमंत्री के अनुसार यह केवल बहानेबाजी है, सच्चाई से बचने की कोशिश है।
मुख्यमंत्री सुक्खू ने विपक्ष पर पलटवार करते हुए कहा कि जयराम ठाकुर के कार्यकाल में ट्रेजरी सरप्लस होने के बावजूद अधिकारियों और कर्मचारियों के करीब 10 हजार करोड़ रुपये के एरियर का भुगतान नहीं किया गया। यह आरोप महज आंकड़ों का नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का भी था।
“मैं संघर्ष से निकला हूं,” मुख्यमंत्री ने कहा, “आम आदमी का दर्द जानता हूं।” उनके शब्दों में मजदूर, किसान, कर्मचारी और बागवान की पीड़ा झलक रही थी। उन्होंने कहा कि सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन हिमाचल के अधिकारों की लड़ाई वह आखिरी सांस तक लड़ेंगे। यह बयान सत्ता के अहंकार से ज्यादा ज़मीन से जुड़े नेता की पहचान कराता है।
जयराम सरकार पर आरोपों की फेहरिस्त यहीं नहीं रुकी। मुख्यमंत्री ने कहा कि पूर्व सरकार ने ठेकेदार मित्रों को खुश करने के लिए करीब 1000 करोड़ रुपये के ऐसे भवन बना दिए, जो आज खाली पड़े हैं। इतना ही नहीं, अपनी सरकार के अंतिम छह महीनों में 5000 करोड़ रुपये की “रेवड़ियां” बांटी गईं, जिससे राज्य की वित्तीय सेहत पर बोझ बढ़ा।
मुख्यमंत्री ने आंकड़ों के जरिए भी तस्वीर साफ की। उन्होंने बताया कि भाजपा सरकार के समय 54,000 करोड़ रुपये की आरडीजी और 16,000 करोड़ रुपये जीएसटी मुआवजा मिला, जबकि कांग्रेस सरकार को पिछले तीन वर्षों में केवल 17,000 करोड़ रुपये की आरडीजी प्राप्त हुई। इसके बावजूद मौजूदा सरकार ने वित्तीय अनुशासन अपनाते हुए 26,683 करोड़ रुपये अपने संसाधनों से जुटाकर अर्थव्यवस्था को संभाला है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि आरडीजी हिमाचल को संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत मिलने वाला अधिकार है। यदि हर साल मिलने वाली लगभग 10 हजार करोड़ रुपये की यह सहायता बंद होती है, तो छोटे पहाड़ी राज्य के बजट पर इसका गहरा असर पड़ेगा। आरडीजी समाप्त करने को उन्होंने केंद्र सरकार का “सौतेला व्यवहार” बताया और 1 फरवरी को पेश हुए केंद्रीय बजट के दिन को हिमाचल के इतिहास का “काला दिन” करार दिया।
मुख्यमंत्री ने भावनात्मक लहजे में कहा, “भगवान जयराम ठाकुर और भाजपा विधायक दल को सद्बुद्धि दें।” उन्होंने स्पष्ट किया कि यह किसी दल की लड़ाई नहीं, बल्कि हिमाचल के हक की लड़ाई है। वित्तीय अनुशासन का असर आने वाले समय में सुधारों के रूप में जनता देखेगी—यह उनका भरोसा था।
उन्होंने भाजपा विधायक दल और सांसदों को खुली चुनौती दी कि यदि वे उनके साथ प्रधानमंत्री से नहीं मिलना चाहते, तो खुद जाकर प्रदेश का पक्ष रखें। हिमाचल कभी भी रेवेन्यू सरप्लस राज्य नहीं हो सकता—यह भौगोलिक और आर्थिक सच्चाई है। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि नेता प्रतिपक्ष सत्ता की कुर्सी के सपनों में इतने मशगूल हैं कि उन्हें प्रदेश का हित दिखाई नहीं दे रहा।
सुक्खू ने यह भी दावा किया कि जयराम ठाकुर के मुख्यमंत्री रहते हुए धूमल गुट ने उनके वित्तीय कुप्रबंधन पर सवाल उठाए थे और अनुराग ठाकुर तक ने इस पर चिंता जताई थी। उन्होंने पूछा कि इतनी बड़ी आरडीजी और जीएसटी कंपनसेशन के बावजूद कर्मचारियों को छठे वेतन आयोग का एरियर क्यों नहीं दिया गया।
स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर भी मुख्यमंत्री ने तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि जयराम सरकार ने कुछ निजी अस्पतालों को लाभ पहुंचाने के लिए 450 करोड़ रुपये हिमकेयर योजना के नाम पर लुटा दिए। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि कुछ निजी अस्पताल अच्छे हैं, लेकिन योजना का दुरुपयोग हुआ।
शिमला से दिल्ली की ओर रवाना होते मुख्यमंत्री के शब्दों में सियासत की धार भी थी और प्रदेश के लिए चिंता की सच्ची आवाज भी। अब देखना यह है कि दिल्ली के गलियारों में हिमाचल की यह आवाज कितनी दूर तक गूंज पाती

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