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मंडियों में 250–400 रुपये प्रति क्रेट तक सिमटे भाव, लागत भी नहीं निकल रही; कई किसानों ने फसल तोड़ना किया बंद, सरकार से राहत की मांग

RamParkash Vats
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परसराम चौहान, प्रगतिशील किसान (चुरवाधार)

टमाटर के दामों में भारी गिरावट, राजगढ़ के किसानों पर आर्थिक संकट किसानों नहीं मिल पा रहा लागत मूल्य ।

SIRMOUR: REPORTER KAPIL SHARMA

रसराम चौहान, प्रगतिशील किसान (चुरवाधार)

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के राजगढ़ क्षेत्र में टमाटर उत्पादक किसान इन दिनों भारी आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। प्रदेश के प्रमुख टमाटर उत्पादक क्षेत्रों में शामिल राजगढ़ में इस बार टमाटर की बंपर पैदावार हुई है, लेकिन मंडियों में मिल रहे बेहद कम दामों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। हालत यह है कि कई किसानों ने खेतों से टमाटर तोड़ना तक बंद कर दिया है क्योंकि मंडियों तक भेजने का खर्च भी निकलना मुश्किल हो गया है। किसानों का कहना है कि यदि जल्द राहत नहीं मिली तो टमाटर की खेती घाटे का सौदा बन जाएगी।

राजगढ़ क्षेत्र की अर्थव्यवस्था काफी हद तक टमाटर की खेती पर आधारित है। यहां से तैयार फसल दिल्ली, चंडीगढ़ और उत्तर भारत की कई बड़ी मंडियों में भेजी जाती है। लेकिन इन दिनों मंडियों में टमाटर के भाव केवल 250 से 400 रुपये प्रति क्रेट तक सिमट गए हैं। एक क्रेट में करीब 20 से 25 किलो टमाटर पैक किया जाता है, जबकि केवल दिल्ली तक एक क्रेट पहुंचाने का परिवहन खर्च लगभग 130 रुपये और चंडीगढ़ तक करीब 70 रुपये आता है। इसके अलावा खेत से सड़क तक ढुलाई, मजदूरी और पैकिंग का खर्च अलग से उठाना पड़ता है।
किसानों का कहना है कि टमाटर की खेती में शुरुआत से ही भारी निवेश करना पड़ता है। पौध की कीमत, सिंचाई, खाद, कीटनाशक, बांस, रस्सी, निराई-गुड़ाई और मजदूरी पर लगातार खर्च होता है। करीब तीन महीने की मेहनत के बाद जब फसल तैयार होती है तो मंडियों में मिल रहे मौजूदा दाम लागत निकालने के लिए भी पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे में किसानों के सामने अगली फसल की तैयारी और परिवार का खर्च चलाना बड़ी चुनौती बन गया है।
इस बार राजगढ़ क्षेत्र में टमाटर की बंपर पैदावार हुई है और खेत लाल टमाटरों से भरे पड़े हैं। लेकिन जानकारों के अनुसार दक्षिण भारत के बेंगलुरु क्षेत्र से समय से पहले बड़ी मात्रा में टमाटर की आवक होने के कारण दिल्ली और चंडीगढ़ जैसी मंडियों में आपूर्ति बढ़ गई है। इसी वजह से स्थानीय किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा। व्यापारियों का भी मानना है कि जब तक बाहरी राज्यों से आवक कम नहीं होगी, तब तक दामों में बड़ी तेजी की संभावना नहीं है।

स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि कुछ किसानों ने टमाटर तोड़ना ही बंद कर दिया है। उनका कहना है कि मंडियों तक माल भेजना सीधे-सीधे घाटे का सौदा बन चुका है। कई किसान अब सोशल मीडिया के माध्यम से भी अपना दर्द सरकार और आम जनता तक पहुंचा रहे हैं। चुरवाधार गांव के सेवानिवृत्त शिक्षक एवं प्रगतिशील किसान परसराम चौहान ने भी कम दामों को लेकर अपनी पीड़ा साझा की है।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिस टमाटर का किसान को मंडी में मुश्किल से 10 से 20 रुपये प्रति किलो के बराबर मूल्य मिल रहा है, वही टमाटर खुदरा बाजार में 40 से 50 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है। यानी किसान और उपभोक्ता के बीच कीमतों में बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है, जिसका लाभ किसानों को नहीं मिल पा रहा।

टमाटर उत्पादकों ने सरकार और कृषि विपणन विभाग से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। किसानों का कहना है कि यदि उन्हें उचित मूल्य सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी व्यवस्था नहीं की गई तो आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में किसान टमाटर की खेती छोड़ने पर मजबूर हो सकते हैं। इससे न केवल किसानों की आजीविका प्रभावित होगी बल्कि राजगढ़ क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था पर भी इसका व्यापक असर पड़ेगा।

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