Reading: हिमाचल की आर्थिक बदहाली के लिए न तो केवल भाजपा जिम्मेदार है और न ही केवल कांग्रेस। जिम्मेदारी उस राजनीतिक संस्कृति की है जिसमें दीर्घकालिक सोच, कठिन फैसलों और संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग को प्राथमिकता नहीं दी गई।

हिमाचल की आर्थिक बदहाली के लिए न तो केवल भाजपा जिम्मेदार है और न ही केवल कांग्रेस। जिम्मेदारी उस राजनीतिक संस्कृति की है जिसमें दीर्घकालिक सोच, कठिन फैसलों और संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग को प्राथमिकता नहीं दी गई।

RamParkash Vats
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संपादकीय चिंतन ,मंथन और विश्लेषण- Editor Ram Parkash Vats

हिमाचल प्रदेश की आर्थिक स्थिति आज गंभीर बहस और आत्ममंथन की मांग कर रही है। लगातार बढ़ता कर्ज, सीमित राजस्व स्रोत, केंद्र पर बढ़ती निर्भरता और आम जनता पर करों का बढ़ता बोझ—ये सभी संकेत किसी एक सरकार की विफलता नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही नीतिगत दिशाहीनता का परिणाम हैं। प्रश्न स्वाभाविक है—इस आर्थिक बदहाली के लिए जिम्मेदार कौन है, भाजपा या कांग्रेस? लेकिन इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या किसी एक दल को दोषी ठहराकर हम समाधान की ओर बढ़ सकते हैं?

पिछले लगभग 54 वर्षों में हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा दोनों को कई बार सत्ता संभालने का अवसर मिला। सत्ता परिवर्तन होता रहा, घोषणाएं बदलती रहीं, लेकिन प्रदेश की आर्थिक संरचना वही की वही रही—अनुदान आधारित, केंद्र-निर्भर और कर्ज-आश्रित। आत्मनिर्भरता को राजनीतिक भाषणों में जरूर स्थान मिला, पर उसे व्यवहारिक नीति में बदलने का साहस किसी भी सरकार ने नहीं दिखाया। परिणामस्वरूप हिमाचल आज उस मुकाम पर खड़ा है जहां बिना केंद्रीय सहायता के बजट संतुलन तक कठिन हो गया है।

आर्थिक कमजोरी का सबसे बड़ा संकेत बढ़ता हुआ कर्ज है। हर नई सरकार अपने कार्यकाल की शुरुआत ही खाली खजाने और भारी देनदारियों का हवाला देकर करती है। कर्ज चुकाने के लिए फिर नया कर्ज लिया जाता है और यह दुष्चक्र लगातार गहराता जाता है। इसका सीधा बोझ आम जनता पर पड़ता है—कभी बिजली-पानी के दाम बढ़ाकर, कभी बस किराया, कभी नए कर और उपकर लगाकर। विकास के नाम पर जनता से वसूली तो हो रही है, लेकिन उस अनुपात में स्थायी आय के स्रोत विकसित नहीं हो पा रहे।

विडंबना यह है कि हिमाचल जैसे संसाधन-संपन्न प्रदेश की आय संरचना इतनी कमजोर है। जल, वन, पर्यटन और खनिज—ये सभी ऐसे क्षेत्र हैं जिनसे प्रदेश को दीर्घकालिक और स्थिर राजस्व मिल सकता था। लेकिन जल विद्युत परियोजनाओं में हिमाचल को आज भी उसके संसाधनों के अनुरूप हिस्सा नहीं मिल पाया। अधिकांश परियोजनाएं केंद्रीय या बाहरी कंपनियों के नियंत्रण में रहीं, जबकि पर्यावरणीय और सामाजिक कीमत प्रदेश ने चुकाई। यह स्थिति कांग्रेस और भाजपा—दोनों के शासनकाल में बनी रही, जो साझा राजनीतिक विफलता को दर्शाती है।

उद्योगों की स्थापना और स्थानीय रोजगार सृजन भी केवल कागजी नीतियों तक सीमित रहा। विशेष पैकेजों और रियायतों के बावजूद औद्योगिक विकास टिकाऊ नहीं बन पाया। कई बार नीतियां बदली गईं, निवेशकों में अस्थिरता का संदेश गया और स्थानीय युवाओं को स्थायी रोजगार नहीं मिला। सरकारें अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए घोषणाएं करती रहीं, लेकिन दीर्घकालिक आर्थिक रोडमैप तैयार नहीं हो सका।

यह भी सच है कि जब देश के कई राज्यों ने नवाचार, उद्योग, कृषि-आधारित मूल्यवर्धन और सेवा क्षेत्र में निवेश कर अपनी अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी, तब हिमाचल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और तात्कालिक प्रबंधन में उलझा रहा। सत्ता में रहते हुए विपक्ष को दोष देना आसान रहा, लेकिन सत्ता से बाहर आते ही वही समस्याएं याद आना—यह प्रवृत्ति प्रदेश की राजनीति की स्थायी बीमारी बन चुकी है।

ऐसे में यह कहना अधिक यथार्थपरक होगा कि हिमाचल की आर्थिक बदहाली के लिए न तो केवल भाजपा जिम्मेदार है और न ही केवल कांग्रेस। जिम्मेदारी उस राजनीतिक संस्कृति की है जिसमें दीर्घकालिक सोच, कठिन फैसलों और संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग को प्राथमिकता नहीं दी गई। दोष उस व्यवस्था का है जिसने कर्ज को विकास का विकल्प बना लिया और आत्मनिर्भरता को केवल नारे तक सीमित रखा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल दोषारोपण से आगे बढ़ें। प्रदेश को एक स्पष्ट, व्यावहारिक और संसाधन-आधारित आर्थिक नीति की जरूरत है—जहां जल, पर्यटन और स्थानीय उद्योगों से स्थायी आय सुनिश्चित हो; जहां खर्च और आय के बीच संतुलन बने; और जहां विकास का भार केवल जनता पर न डाला जाए। जब तक भाजपा और कांग्रेस दोनों दल दलगत राजनीति से ऊपर उठकर ईमानदार आर्थिक सुधारों पर सहमति नहीं बनाएंगे, तब तक हिमाचल की आर्थिक स्थिति सुधरने के बजाय और अधिक नाजुक होती चली जाएगी।

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