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लोकतंत्र के लिए अभिशाप: चुनाव और शराब का साया

RamParkash Vats
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न्यूज इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स

चुनाव लोकतंत्र का महापर्व माना जाता है, जहां मतदाता अपने विवेक और जनहित को ध्यान में रखकर प्रतिनिधि चुनता है। लेकिन जब चुनावी माहौल में शराब की बोतलें झाड़ियों से बरामद होने लगें, तो यह लोकतंत्र की आत्मा पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। देहरा क्षेत्र में चुनाव से पहले झाड़ियों में 37 बोतल अवैध शराब मिलना केवल एक पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि उस कड़वी सच्चाई की ओर संकेत है कि चुनावों को प्रभावित करने के लिए हर हथकंडा अपनाया जाता है।वर्षों से चुनावों के दौरान शराब वितरण के आरोप लगते रहे हैं। कई बार यह आरोप केवल चर्चा तक सीमित रहते हैं, तो कई बार पुलिस कार्रवाई इन आशंकाओं को सच साबित करती दिखती है। विडंबना यह है कि जहां जागरूक मतदाता लोकतंत्र को मजबूत करने का संकल्प लेते हैं, वहीं कुछ लोगों के लिए चुनाव शराबियों के लिहाज से “खुशगवार मौसम” बन जाते हैं। मुफ्त शराब का लालच मताधिकार की पवित्रता को कमजोर करता है और जनमत को प्रभावित करने का एक आसान माध्यम बन जाता है।झाड़ियों में शराब छिपाकर रखना इस बात का संकेत है कि चुनाव को प्रभावित करने की कोशिशें अब खुलेआम नहीं, बल्कि गुप्त तरीकों से की जाती हैं। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मतदाता की स्वतंत्र सोच को खरीदने की मानसिकता को भी उजागर करता है। यदि वोट की कीमत शराब की बोतल बन जाए, तो लोकतंत्र की असली ताकत कमजोर पड़ने लगती है।ऐसे में केवल पुलिस कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं है। समाज, प्रशासन और मतदाताओं—तीनों को मिलकर इस प्रवृत्ति के खिलाफ खड़ा होना होगा। क्योंकि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब वोट विवेक से पड़ेगा, न कि किसी लालच या प्रलोभन के प्रभाव में।

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