राजस्व घाटा अनुदान (RDG Grant) को लेकर हिमाचल प्रदेश की राजनीति एक बार फिर तीखे आरोप–प्रत्यारोप के दौर में पहुंच गई है। पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर की हालिया प्रेस वार्ता ने इस मुद्दे को नए सिरे से बहस के केंद्र में ला दिया है। सवाल यह नहीं है कि दोष किसका है, बल्कि यह है कि इस बहस से हिमाचल के आर्थिक भविष्य को लेकर क्या दिशा निकलती है।

जयराम ठाकुर का तर्क है कि RDG ग्रांट का खत्म होना अचानक लिया गया फैसला नहीं था। 15वें वित्त आयोग के गठन के समय ही यह संकेत दे दिया गया था कि यह अनुदान स्थायी नहीं है। देश के 17 राज्यों को यह सहायता मिलती थी और समय के साथ सभी राज्यों को मिलने वाली राशि में कमी आई। इस संदर्भ में यह कहना अनुचित नहीं होगा कि वर्तमान संकट को केवल केंद्र सरकार के निर्णय तक सीमित कर देना अधूरा विश्लेषण है।
हालांकि, यहां राज्य सरकार की भूमिका भी सवालों के घेरे में आती है। वित्त आयोग के समक्ष किसी भी राज्य की आर्थिक मजबूती, आवश्यकताओं और भविष्य की योजनाओं को प्रभावी ढंग से रखना अनिवार्य होता है। यदि हिमाचल को मिलने वाली RDG ग्रांट बंद हुई है, तो यह भी जरूरी है कि राज्य सरकार स्पष्ट करे कि उसने अपने पक्ष में कितनी मजबूती से प्रस्तुति रखी और किन आधारों पर वह असफल रही।
नेता प्रतिपक्ष द्वारा मुख्यमंत्री सुक्खू से “2032 तक हिमाचल को देश के सबसे समृद्ध राज्यों में शामिल करने” के विजन पर सवाल उठाना राजनीतिक बयान से आगे जाकर एक नीतिगत प्रश्न बन जाता है। आत्मनिर्भरता केवल नारे से नहीं आती, उसके लिए राजस्व बढ़ाने के नए स्रोत, खर्च पर नियंत्रण और दीर्घकालिक आर्थिक सुधार जरूरी होते हैं। जनता यह जानना चाहती है कि सरकार के पास इसका ठोस रोडमैप क्या है।
केंद्र सरकार के बजट मॉडल को लेकर जयराम ठाकुर द्वारा प्रस्तुत आंकड़े यह संकेत देते हैं कि देश की आर्थिक नीति सब्सिडी आधारित ढांचे से पूंजीगत निवेश की ओर बढ़ी है। बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, शिक्षा और रक्षा पर बढ़ता खर्च दीर्घकालिक विकास का आधार बन सकता है। लेकिन पहाड़ी और संसाधन-सीमित राज्य होने के नाते हिमाचल को इस मॉडल से कितना सीधा लाभ मिल पा रहा है, यह भी एक अहम प्रश्न है।
हिमाचल को केंद्र से मिलने वाली वित्तीय सहायता, कर हस्तांतरण और विशेष ऋण योजनाएं यह दर्शाती हैं कि सहयोग की कमी नहीं है। बावजूद इसके, राज्य की आर्थिक सेहत लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। इसका अर्थ यह है कि समस्या केवल केंद्र–राज्य संबंधों तक सीमित नहीं, बल्कि राज्य के भीतर राजकोषीय अनुशासन, प्रशासनिक प्राथमिकताओं और विकास मॉडल से भी जुड़ी है।
RDG ग्रांट का मुद्दा यदि केवल राजनीतिक हथियार बनकर रह गया, तो इससे हिमाचल की जनता को कोई राहत नहीं मिलेगी। आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता और विपक्ष मिलकर यह तय करें कि अनुदान पर निर्भरता कैसे कम की जाए और प्रदेश को स्थायी आर्थिक आत्मनिर्भरता की राह पर कैसे ले जाया जाए। वरना आरोपों की यह लड़ाई जारी रहेगी और असली सवाल—हिमाचल की आर्थिक मजबूती—हर बार की तरह पीछे छूटता चला जाएगा।

