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केंद्रीय बजट और हिमाचल प्रदेश: अपेक्षाएँ अधूरी, चुनौतियाँ गहरी

RamParkash Vats
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चिंतन मंथन और विश्लेषण: संपादक राम प्रकाश वत्स

केंद्रीय बजट 2026-27: हिमाचल को मिला अप्रत्यक्ष लाभ, लेकिन RDG का नुकसान और कृषि व पर्यटन की अनदेखी से पर्वतीय विकास पर खतरे के साए”

केंद्रीय बजट 2026-27 में हिमाचल प्रदेश के लिए कोई बड़ी प्रत्यक्ष घोषणा न होते हुए भी राज्य को कुछ अप्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होंगे। सड़क, रेल और बुनियादी ढांचे में बढ़ाए गए केंद्रीय पूंजीगत व्यय का असर सीमावर्ती और दुर्गम क्षेत्रों में विकास कार्यों के रूप में दिखाई दे सकता है। बेहतर कनेक्टिविटी से न केवल स्थानीय लोगों की जीवनशैली और सुविधाएँ सुधरेंगी, बल्कि पर्यटन और व्यापार को भी गति मिलने की उम्मीद है। जल जीवन मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत हिमाचल को निरंतर सहायता मिलती रहेगी। ग्रीन एनर्जी और पर्यटन को बढ़ावा देने की नीतियाँ राज्य के लिए विशेष महत्व रखती हैं। कुल मिलाकर बजट बड़े पैकेज से अधिक, दीर्घकालीन और संतुलित विकास की संभावनाएँ लेकर आया है।

हालांकि, अपेक्षाएँ और आवश्यकताएँ पूरी तरह से पूरी नहीं हुई हैं। हिमाचल प्रदेश ने अपनी भौगोलिक परिस्थितियों, सीमित संसाधनों और अधिक विकास लागत के कारण केंद्रीय बजट में कुछ विशेष प्रावधानों की उम्मीद की थी, लेकिन वास्तविकता निराशाजनक रही। सबसे बड़ा झटका राज्य को राजस्व घाटा अनुदान (Revenue Deficit Grants – RDG) के रूप में लगा। दशकों से हिमाचल अपने सीमित राजस्व और उच्च प्रशासनिक खर्चों की भरपाई इस अनुदान से करता रहा है। 16वें वित्त आयोग द्वारा छोटे और पर्वतीय राज्यों को इस अनुदान से वंचित करना राज्य की वित्तीय स्थिरता पर गंभीर असर डाल सकता है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और मंत्रिमंडल ने इसे “काले दिन” जैसा निर्णय बताया है। इसका सीधा परिणाम शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसी बुनियादी सेवाओं पर दबाव के रूप में दिखाई देगा।

इसके अलावा हिमाचल की अर्थव्यवस्था में सेब उत्पादन की अहमियत को नजरअंदाज किया गया है। राज्य के किसानों ने बजट में उत्पादन लागत घटाने, भंडारण, प्रसंस्करण और बाजार समर्थन के लिए कोई ठोस योजना न होने पर अपनी चिंता व्यक्त की है। इससे बागवानी और कृषि आधारित व्यवसायों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

रेल नेटवर्क विस्तार में भी अपेक्षाएँ अधूरी रहीं। भानुपाली-बिलासपुर और बड्डी-चंडीगढ़ जैसी परियोजनाओं के लिए दीर्घकालीन वित्तीय प्रावधान नहीं किए गए हैं, जिससे राज्य के औद्योगिक और परिवहन विकास में धीमापन आ सकता है। पर्यटन क्षेत्र में भी हिमाचल को विशेष पहचान दिलाने वाली योजनाएँ जैसे बौद्ध सर्किट को नजरअंदाज किया गया। यह राज्य के सांस्कृतिक और धार्मिक पर्यटन को नई दिशा देने की संभावना को कमजोर करता है।

संपादकीय दृष्टि से देखा जाए तो केंद्रीय बजट पर हिमाचल प्रदेश सरकार की नाराज़गी केवल राजनीतिक बयानबाज़ी नहीं है, बल्कि यह आर्थिक चिंता का गंभीर संकेत है। मुख्यमंत्री सहित वरिष्ठ नेताओं ने पर्वतीय राज्यों की अनदेखी का आरोप लगाया है, जो संघीय व्यवस्था में संतुलन पर प्रश्न खड़ा करता है।

विशेषकर RDG के समाप्त होने का निर्णय हिमाचल जैसे सीमित संसाधनों वाले और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य के लिए चुनौतीपूर्ण है। 1952 से यह अनुदान राज्य की आर्थिक रीढ़ रहा है। अब इस सहायता के अभाव में राज्य को विकास कार्यों में कटौती करनी पड़ सकती है या ऋण पर निर्भरता बढ़ानी पड़ेगी, जो दीर्घकाल में आर्थिक असंतुलन को और गहरा सकता है। मुख्यमंत्री ने इसे गरीब और किसान विरोधी कदम बताया है, जबकि उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने राज्य की असाधारण भौगोलिक परिस्थितियों को नजरअंदाज करने की चिंता व्यक्त की।

राज्य मंत्री विक्रमादित्य सिंह की चेतावनी भी गंभीर है कि RDG के अभाव में सेवा-डिलीवरी और विकास योजनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। यही वजह है कि अब केंद्र और राज्य के बीच संवाद का महत्व बढ़ गया है। केवल संसाधन वितरण से काम नहीं चलेगा; आवश्यक है कि एक संवेदनशील और न्यायसंगत वित्तीय दृष्टिकोण अपनाया जाए, जो केवल आर्थिक अनुशासन ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय न्याय को भी सुनिश्चित करे।

नेता विपक्ष जयराम ठाकुर ने मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें अपनी नाकामियों का ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ने के बजाय राज्य की वित्तीय स्थिति सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। चुनावी वादों को पूरा करना केंद्र का दायित्व नहीं है, लेकिन कांग्रेस सरकार केंद्र प्रायोजित 191 योजनाओं में अपनी मात्र 10 फीसदी हिस्सेदारी देने से भी भाग रही है। जयराम ने कहा कि केंद्र सरकार 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य के आधार पर पूरे देश के लिए समान नीतियां बनाती है और इसका लाभ सभी राज्यों को समान रूप से मिलता है।केंद्रीय बजट 2026-27 ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक ऐतिहासिक बदलाव लेकर आया है। मनरेगा योजना को बंद कर नई योजना “विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन ग्रामीण” लागू की जा रही है। इस योजना के लिए बजट में 95,692.31 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जबकि पुरानी मनरेगा की लंबित देनदारियों और ट्रांजिशन अवधि के लिए अतिरिक्त 30,000 करोड़ रुपये दिए गए हैं। कुल मिलाकर दोनों योजनाओं का बजट सवा लाख करोड़ रुपये से अधिक है।नेता विपक्ष ने कहा कि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में लगभग 1.72 लाख कार्य लंबित हैं और 655 पंचायतों में लोगों को एक दिन का भी रोजगार नहीं मिला। हिमाचल में मनरेगा मजदूरों की दिहाड़ी अगस्त से नहीं मिली है। नई योजना केवल मजदूरी का माध्यम नहीं बल्कि मिशन है, जिसमें अब ग्रामीण परिवारों को 125 दिनों का रोजगार गारंटी दी गई है और भुगतान की अवधि 15 दिन से घटाकर साप्ताहिक कर दी गई है।जयराम ने कहा कि हिमाचल जैसे हिमालयी राज्यों के लिए केंद्र केवल 10 प्रतिशत हिस्सेदारी लेगा, लेकिन सुक्खू सरकार राजनीतिक कारणों और कुप्रबंधन के चलते इसे समय पर देने में विफल रही है। इसका सीधा खामियाजा प्रदेश की जनता भुगत रही है।

कुल मिलाकर, केंद्रीय बजट हिमाचल प्रदेश के लिए संतुलित विकास की संभावनाएँ लेकर आया है, लेकिन राज्य की अपेक्षाएँ पूरी नहीं हुईं। बजट के ठोस लाभ तो सीमित और अप्रत्यक्ष हैं, जबकि कई महत्वपूर्ण क्षेत्र—जैसे RDG, सेब उत्पादन, रेलवे विस्तार और पर्यटन—के लिए स्पष्ट योजनाएँ न होने से चुनौतियाँ बनी रहती हैं। अब राज्य और केंद्र के लिए यह समय है कि विवाद और आरोप-प्रत्यारोप के बजाय संवाद और सहयोग के माध्यम से समाधान खोजें, ताकि हिमाचल प्रदेश की सीमावर्ती, पर्वतीय और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था की स्थिरता और विकास सुनिश्चित हो सके।

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